Cancer ki jankari hindi me

कैंसर- के प्रति लोगों में  एक मिथ्या  विचार-

कैंसर का नाम लोगों को वर्षों से भयाक्रांत करता रहा है ।प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में और मस्तिष्क में यह बात गहरी बैठी हुई है कि कैंसर अर्थात 'मौत '। प्रायः लोग चिकित्सक से मात्र यह मालूम होने पर कि उन्हें कैंसर है ,कोई उपचार नहीं कराते हैं ,क्योंकि "कैंसर का उपचार संभव नहीं "कि गलत धारणा आड़े आ जाती हैं ।वह समझते हैं कि यह जानलेवा बीमारी है, जिससे इसके रोगी के मानस पटल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।अब कैंसर असाध्यकारी नहीं रहा। इस की प्रारंभिक अवस्था का पता लग जाने पर रोगी को उपचार द्वारा सामान्य जीवन जीने योग्य बनाया जा सकता है ।अतः यहां यह और भी महत्व पूर्ण हो जाता है कि कैंसर की जानकारी सरल भाषा में सर्वसाधारण को प्राप्त हो ताकि इन भ्रांतियों से छुटकारा मिल सके। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आज यह कैंसर लाइलाज नहीं रहा है ।आरंभिक अवस्था में पहचाने गए कैंसर के मामलों में आज सही उपचार द्वारा 90% से अधिक मरीज स्वस्थ हो जाते हैं ,पर जैसे जैसे रोग फैलता है और बढ़ता जाता है, इलाज की कामयाबी की  दर घटती जाती है ।इसलिए विशेषज्ञों का मत है कि इस खतरे को टालने के लिए एक उम्र के बाद उनके प्रति सतर्क हो जाना आवश्यक है ।इसके लिए आज ऐसी बहुत से सरल विधियां उपलब्ध हैं जो कैंसर को उनकी अंकुर अवस्था में पहचानने में सक्षम है ।
इसके साथ ही यह अत्यंत आवश्यक है कि जैसे ही कोई असाधारण लक्षण नजर जाए ,आप उसकी अवहेलना ना करें और बिना किसी संकोच के चिकित्सक की सलाह लें ।
What is cancer?-

पहले कैंसर के रोग में एक प्रकार का उभार व कठोर गांठ पैदा होती है और स्वाभाविक गांठ  व वृद्धि को cancer कहते हैं। यह दीमक के घर के समान चारों ओर फैलना शुरु करता है ।यह पुरानी गांठ ,ग्रंथि ,व पुराने जख्म मे अपना  घर बनाकर धीरे-धीरे वह कई बार बड़े वेग से बढने लगता है। यह चाहे किसी भी अंग में हो ,उस अंग की सभी क्रियाएं विकृत हो जाती हैं और वे सभी अंग क्रियाहीनं हो जाते हैं ।जहां पर कैंसर होता है ,वहां पर बड़ी गांठ और सूजन हो जाती है ।कैंसर शब्द लैटिन भाषा से अंग्रेजी में आया है ।कैंसर का अर्थ है  केकड़ा।

Cancer like a crab

 यह एक विशेष जाति का अर्बुद है ,जिस का प्रकार केकड़े के समान चारों ओर फैला दिखाई देता है ।
सांप की बांबी की तरह व शिवलिंग की तरह अनेक-अनेक  शिखरों वाली तथा दृढ व ऊंची वाली हो जाती है।पकने पर मवाद बहने लगता है और वेदना उत्पन्न होकर अनेक  मुखों वाली होकर चारों ओर फैलने लगती है ।इसका घाव चिकित्सा करने पर भी ठीक नहीं होता ।
मुंह पर कील मुंहासे उत्पन्न हो जाएं ,जिन का रंग खराब हो, शरीर के किसी भाग में गांठ  या सूजन हो जाए और उसमे पीड़ा हो तो यह कैंसर का लक्षण है। ।अधिक आयु की स्त्रियों को जब यह रोग उत्पन्न होता है तो, उनके गर्भाशय से बार-बार अधिक मात्रा में रक्तस्राव होने लगता है ।फिर भी यह अत्यंत आवश्यक है कि किसी पुराने अनुभवी व अच्छे वैद्य, डॉक्टर से जांच करा लें ।
कैंसर एक गांठो  या घावों के समूह का नाम है। वैसे चिकित्सा विभाग इसे कार्सिनोमा के नाम से पुकारता है ।इसी से मिलते जुलते एक रोग को सारकोमा करते हैं और इन दोनों को साधारणतया लोग कैंसर के नाम से संबोधित करते हैं ।
आयुर्वेद तथा शास्त्रों में इसे दुष्टार्बुद तथा संकटार्बुद के नाम से संबोधित किया जाता है ।सारकोमा, कार्सिनोमा से ज्यादा भयंकर होता है और यह प्रायः ऑपरेशन से ही ठीक होता है। रेडिएशन का इस पर प्रायः कम ही असर होता है ।
सार कोमा की प्रवृत्ति अत्यधिक फैलने की होती है ।कुछ सारकोमा जैसे लिंफोसारकोमा रेडिएशन द्वारा भी रुक जाते हैं ।
आयुर्वेद में सार कोमा तथा कार्सिनोमा का एक विशिष्ट इलाज ढूंढ लिया गया है वह है -एक ही औषधि "सर्व पिष्टी"  से सभी प्रकार के ,सभी स्टेज के कैंसर का इलाज सफलतापूर्वक कर दिखाया है ।अभी तक खतरनाक समझे जाने वाले  एक्यूट ल्यूकेमिया ,ब्रेन कैंसर ,लीवर कैंसर आदि को भी सर्व पिष्टि ने साध्य बना दिया है। देश-विदेश में एक्यूट ल्यूकेमिया के बारे में कहा जाता है कि यह किसी भी होगी को जीने के लिए कुछ ही समय देता है जबकि सर दृष्टि से चिकित्सा करने पर रोगी को Jeene Ke liye kuch hi Samay deta hai  jabki sarvapisti se chikitsa karne par Rogi ko शत प्रतिशत ठीक किया जा सकता है ।
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कैंसर उत्पन्न करने वाले कारण-

 हमारे शरीर का प्रत्येक अंग बहुत सूक्ष्म कोशिकाओं से मिलकर बना है ।इन सभी कोशिकाओं का कार्य भिन्न भिन्न होता है। शरीर में कोशिकाएं बनती हैं और बिगड़ती रहती हैं ।नई कोशिकाओं का स्थान लेती हैं ।परंतु जब नई कोशिकाएं पुरानी मृत कोशिकाओं का स्थान नहीं लेती और मृत अथवा अनावश्यक कोशिकाएं की संख्या बढ़ने लगती है, तो इनसे शरीर में विषैले फोड़े उत्पन्न हो जाते है, जिसे कैंसर कहते हैं ।यह फोड़ा फैलते हुए शरीर के अन्य भागों में तथा रक्त मे भी पहुंच जाता है।
कैंसर होने के अनेक कारण भी हैं-

1-बुढ़ापे में जब व्यक्ति के शरीर की कोशिकाएं निष्क्रिय होने लगती हैं ,तो शरीर के किसी भी अंग में कैंसर होने का भय उत्पन्न हो जाता है ।
2-कैंसर अनुवांशिक भी हो सकता है
3-विषाणुओं के संक्रमण और सूर्य के प्रभाव से शरीर की कोशिकाएं कैंसर का रूप धारण कर लेती हैं ।
4-कोलतार एक ऐसा पदार्थ है जो शरीर के स्पर्श के पश्चात कैंसर उत्पत्ति करने वाले पदार्थ पैदा करता है। इसी प्रकार कोयले की खानों में कार्य करने वाले मजदूर,जो की कोयले के धुएं को स्वाश के साथ लेते हैं, फेफड़े के कैंसर के शिकार हो जाते हैं ।
5-शरीर के अंदर विभिन्न प्रकार के हार्मोन होते हैं जो शरीर की विकास तथा स्वास्थ्य में सहायक होते हैं, इनमें वे सेक्स हार्मोन भी होते हैं ,जो कि कैंसर की उत्पत्ति में सहायक सिद्ध होते हैं। स्तन का कैंसर इसका उदाहरण है। रक्त का कैंसर अधिकतर हारमोंस के असंतुलित होने से होता है।
6- कैंसर की उत्पत्ति में जीवाणु भी सहायक हैं यह प्रश्न अभी विचाराधीन हैै।
कैंसर कई प्रकार के होते हैं -जैसे मुंह का कैंसर ,गले का कैंसर ,आमाशय का कैंसर ,आंतों का कैंसर ,फेफड़े का कैंसर ,मूत्राशय का कैंसर, गर्भाशय का कैंसर ,रक्त कैंसर ,मस्तिष्क कैंसर ,अस्थि कैंसर, जीभ का कैंसर इत्यादि ।
आज के अंक में बस इतना ही कैंसर संबंधी अन्य जानकारी हेतु हमारे इस पोस्ट के नीचे फॉलो बटन को दबाएं जिससे कि हमारे द्वारा लिखे गए पोस्ट आप तक तुरंत पहुंच सके और आप नित नयी जानकारियों से अपडेट होते रहें।
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