Janiye Tulsi ke aushdhiya guno ke bare me

 तुलसी का सामान्य परिचय -
रोगों का नाश करने में जिसकी तुलना किसी अन्य वनस्पति से न की जा सके ,इसी कारण से इसे तुलसी कहा जाता है ।हिंदू धर्म में तुलसी को अत्यधिक धार्मिक महत्व दिए जाने के कारण इसे घर घर लगाने की प्रथा है ।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जिस घर में तुलसी रहती है वह घर तीर्थ के समान होता है जहां पर तुलसी का पौधा होता है वहां यमदूत( यानी मच्छर ,बिच्छू,सर्प,एवं हानिकारक कीड़े मकोड़े आदि )  नहीं फटकते ।
 तुलसी का पौधा धार्मिक ही नहीं बल्कि औषधीय गुणों की खान भी है।

Tulsi ka paudha


 तुलसी प्रायः सभी स्थानों पर पाई जाती है।गृहस्थ लोग घर पर लगाते  है, लेकिन जंगलों में अपने आप उग जाती है ।तुलसी की अनेक किस्में होती हैं परंतु गुण धर्म की दृष्टि से काली तुलसी को श्रेष्ठ माना जाता है ।
आमतौर पर सर्वाधिक मिलने वाली तुलसी की पत्तियां हरी होती हैं ।इसका पौधा सामान्यतया 1 से 4 फुट ऊंचा होता है ।पत्तियां एक से 2 इंच लंबे अंडाकार ,आयताकार ग्रंथियुक्त,तीव्र सुगंध वाले होते हैं ।पुष्प चक्रों  में ,मंजरी पर बैगनी या  लाल  आभा लिए लगते हैं ।बीज अंडा कार,चपटे, काले चिन्हों से युक्त भूरे पीतवर्ण लिए होते हैं।आमतौर पर इसे मार्च से जून तक लगाया जाता है और सितंबर अक्टूबर में पौधा सुगंधित मंजरियों से भर जाता है ।शीतकाल में इस पर पुष्प आते हैं, जो बाद में बीज के रूप में पकते हैं ।
तुलसी की विभिन्न भाषाओं में नाम -
तुलसी को संस्कृत में सुरसा या वृंदा, हिंदी में तुलसी ,गुजराती, मराठी ,व बंगाली में तुलसी ,अंग्रेजी में होली बेसिल (Holy basil )लैटिन मे ओसिमम सेक्टम  (Ocimum sanctum )कहते हैं ।
तुलसी के गुण -
आयुर्वेदिक मतानुसार तुलसी रस में कटु,तिक्त,  गुण में लघु ,गर्म प्रकृति की ,विपाक में कटु ,अग्निवर्धक ,कफ और वात नाशक ,पित्त वर्धक, हिचकी, खांसी, दमा ,सिर दर्द,मिर्गी,कृमि,विषविकार,अरूचि,  रक्त विकार, पार्श्वशूल,दुर्गंधनाशक, विषमज्वर, वीर्यवर्धक ,पुराना कब्ज,वमन,व्रण,शोथ,संधि पीड़ा,मोच,मूत्रदाह,  पेशाब में तकलीफ,कुष्ठ, दुर्बलता नाशक ,जीवाणुनाशक ,गर्भ निरोधी आदि गुणों से भरपूर होता है।
 यूनानी चिकित्सा पद्धति में तुलसी को बलवर्धक ,हृदय उत्तेजक,शोथहर, सिर दर्द दूर करने वाली, पत्ते सुंघाने से मुर्छा और चबाने से मुंह की दुर्गंध दूर करने वाली ,सूखी खांसी,शुक्र को गाढ़ा करने और तुलसी के  बीज को प्रवाहिका में लाभप्रद एवं कर्णशूल में भी गुणकारी बताया गया है ।
 वैग्यानिक दृष्टि से तुलसी का रासायनिक विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इसके बीजों से हरे पीले रंग का एक स्थिर तेल 17.8 प्रतिशत की मात्रा में मिलता है ।पत्तों और पुष्पमंजरी से लौंग की गंध वाला एक पीले हरे रंग का उड़नशील .10 से .30  प्रतिशत की मात्रा में मिलता है ।इसमें यूजिनाल 71% ,यूजिनाल मिथाइल ईथर  20%  तथा कार्वाकोल 3%  होता है ।जबकि बीजों से प्राप्त स्थिर तेल में कुछ सीटोस्टेराल,स्टीयरीक,लिनोलक,  पामिटिक ,लिनोलेनिक और ओलिक वसा अम्ल पाए जाते हैं। इसके अलावा ग्लाइकोसाइड,टैनिन, सेवानिन और एल्केलाइड्स भी इसमें होते हैं ।पत्तों में अल्प मात्रा में कैरोटीन और विटामिन सी( एस्कार्बिक एसिड) पाया जाता है।
 तुलसी का हानिकारक प्रभाव -
 चरक संहिता के अनुसार तुलसी के साथ दूध का प्रयोग नहीं करना चाहिए ,क्योंकि इससे कुष्ठ आदि चर्म रोगों के होने की संभावना होती है ।कार्तिक के महीने में तुलसी के साथ पान का किया गया सेवन शारीरिक कष्टों को बढ़ा देता है ।अधिक मात्रा में तुलसी का किया गया सेवन मस्तिष्क के लिए भी हानिकारक होता है।
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तुलसी के पत्ते के रस का विभिन्न रोगों में उपयोग हिचकी में
दाद खाज खुजली  में
 आग से जलने पर
 वमन में
 दांतों के दर्द  में
गुहेरी यानि आंखों की पलकों में होने वाली फुंसी में
सर्दी जुकाम और खांसी में
ज्वर में  जबकि
तुलसी के बीज का प्रयोग वीर्य  वृद्धि, नपुंसकता एवं शीघ्रपतन  आदि में किया जाता है ।
स्वप्नदोष में तुलसी के जड़ का काढा  प्रयोग किया जाता है।
चक्कर  आना ,सिर दर्द, नकसीर, पेचिश दस्त, विषैले जंतु के काटने पर एवं नाक की दुर्गंध इत्यादि रोगों में  भी तुलसी का प्रयोग किया जाता है।
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