Giloy ke aushdhiya gun aur upyog

गिलोय का सामान्य परिचय -
भारत में गिलोय की लता सर्वत्र पाई जाती है। बारहों माह सदा हरी भरी रहने वाली यह लता कई वर्षों तक फलती बढ़ती रहती है ।बेल वृक्षों की सहायता से फैलती है। नीम पर चढ़ी गिलोय को उत्तम गुण वाली औषधि माना जाता है। यूं तो यह बेल खेतों की मेड़ों, पहाड़ों की चट्टानों पर भी कुंडलाकार में मिलती है। पत्ते हृदय के आकार के समान, पान के पत्तों के समान व्यवस्थित तरीके से 2 से 4 इंच व्यास के चिकने होते हैं। पत्र डंठल 1 से 3 तथा पत्रवृंत 3-4 इंच लंबा होता है। उस पर पुष्प छोटे-छोटे पीले रंग के गुच्छों में लगते हैं ,जो ग्रीष्म ऋतु में आते हैं ।फल मटर के समान अंडाकार, चिकने ,गुच्छों में लगते हैं ,जो पकने पर लाल रंग के हो जाते हैं।बीज मुड़े हुए टेढे़ मिर्च के दानों के समान, सफेद व चिकने होते हैं ।


Giloy with leaves


गिलोय के विभिन्न भाषाओं में नाम-
 संस्कृत में गिलोय  को गिलोय व अमृता  कहते हैं ,हिंदी में गिलोय व गुरुच कहते हैं ,मराठी में गुलबेल कहते हैं ,गुजराती में गलो कहते हैं, बंगाली में  गुलंच कहते हैं ,अंग्रेजी में गुलाचा कहते हैं एवं लैटिन में टिनोस्पोरा कोर्डिफोलिया (Tino spots cordifolia ) कहते हैं।
गिलोय का नाम अमृता कैसे और क्यों पड़ा-
गिलोय का अमृता नाम पड़ने का कारण कुछ आयुर्वेदिक ग्रंथों  में  इस प्रकार बताया गया है -
एक समय अभिमानी राक्षसों का अधिपति लंकेश्वर रावण कामातुर होकर बलपूर्वक श्री रामचंद्र की पत्नी सीता माता को हर कर ले गया। तब श्री रामचंद्र जी ने वानर सेना की सहायता लेकर स्त्री हरण करने वाले शत्रु रावण को रणभूमि में मार गिराया ।जब देवताओं का शत्रु और बल से गर्व करने वाला रावण मर गया तब देवताओं के राजा इंद्र ने श्री रामचंद्र जी पर अत्यंत प्रसन्न होकर युद्ध में राक्षसों के हाथ से मरे हुए बानरों को अमृत की वर्षा करके जीवित किया था ।इस प्रकार अमृत से भीगे हुए वानरों के शरीर पर से जहां-जहां अमृत की बूंदे गिरी थी वहीं वहीं गिलोय उत्पन्न हुई है।

गिलोय के गुण -
आयुर्वेद साहित्य में गिलोय को ज्वर की  एक महान औषधि बताया गया है ।यह सभी प्रकार के ज्वर जैसे मंद ज्वर, जीर्ण ज्वर, टाइफाइड ,मलेरिया ज्वर आदि में एक उत्तम औषधि है ।इससे गर्मी शांत होती है ,कुनैन की तरह बढ़ाती नहीं है ।
आयुर्वेदिक मतानुसार गिलोय गुण में लघु यानी हल्की, स्निग्ध, तासीर में गर्म ,पचने पर मीठी, स्वाद में चरपरी, कड़वी, खाने में स्वादिष्ट ,ग्राही , बलदायक ,भूख बढ़ाने वाली, बात पित्त और कफ का नाश करने वाली ,रक्त शोधक, धातु वर्धक ,प्यास, जलन,ज्वर, वमन पांडू, खांसी ,बवासीर ,आमवात, पथरी, प्रमेह, नेत्र, केश व चर्म रोग नाशक ,अम्ल पित्त ,उदर विकार, मूत्रावरोध, यकृत रोग ,मधुमेह, कृमि  व क्षय रोग आदि में गुणकारी होती है ।
यूनानी चिकित्सा पद्धति के अनुसार गिलोय को पहले दर्जे की गर्म और खुष्क माना गया है। तिक्त होने से पेट के कीड़ों को मारने में भी सक्षम है ।सभी प्रकार के ज्वरों में भी लाभदायक है ।
वैज्ञानिक मतानुसार गिलोय की रासायनिक संरचना का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इसमें बर्बेरिन एल्केलाइड ,गिलोइन नामक कड़ुआ ग्लूकोसाइड, वसा अल्कोहल ग्लिस्टेराल,अनेक प्रकार की वसा ,अम्ल एवं उड़नसील तेल पाए जाते हैं ।पत्तियों में कैल्शियम, प्रोटीन व फास्फोरस मिलता है एवं तने में स्टार्च  भी मिलता है।। परीक्षणो से ज्ञात हुआ है कि वायरस पर गिलोय का प्राणघातक असर   होता है ।इसमें सोडियम सिलिसिलेट से अधिक दर्द निवारक गुण होता है ।क्षय रोग के जीवाणुओं की वृद्धि को रोक पाना ,उनके सिस्ट बनने में रुकावट पैदा करना, इंसुलिन की उत्पत्ति को बढ़ाकर ग्लूकोज का पाचन करना और रोग संक्रमणोंं को रोकने की क्षमता के कारण एंटीबायोटिक की तरह भी गिलोय कार्य करती है ।
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विभिन्न रोगों में गिलोय के उपयोग-
दांतों में पानी लगना ,मधुमेह रोग ,खुजली ,बवासीर, मोटापा ,मुंहासे ,सभी प्रकार के ज्वर में (गिलोय को धनिया ,चिरायता मिश्री के साथ मिलाकर प्रयोग किया जाता है )।वमन में ,क्षय रोग में( काली मिर्च ,गिलोय ,वंशलोचन ,इलायची के साथ प्रयोग की जाती है) ।
प्रमेह में गिलोय का रस , हल्दी के चूर्ण के साथ प्रयोग किया जाता है ।
 कब्ज की शिकायत हो तो गिलोय का चूर्ण गुड़ के साथ मिलाकर प्रयोग कर सकते हैं ।
इसके अतिरिक्त आमाशय की अम्लता, मस्तिष्क के अनेक विकार, पांडुरोग ,कामला रोग ,, मूत्र विकार एवं नेत्र विकारों में भी गिलोय का सेवन करना लाभप्रद होता है।
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