Janiye kaise ho jata hai Tetanus, symptoms and treatment

What is tetanus
टिटनस एक संक्रामक रोग है जो अनाक्सीजीवी (clostridium tetani) द्वारा होता है। इसमें जबड़ों का बंद होना(lock jaw) ,पेशियों में प्रवेगी  आकर्ष होना तथा सारे शरीर में तानिक कठोरता (tonic rigidity)होना आदि लक्षण होते हैं।
इसे लाक जा ,धनुस्तंभ ,हनु स्तंभ ,धनुर्वात आदि नामों से भी जाना जाता है ।
टिटनस एक घातक रोग है जिसकी मृत्यु दर आज भी 40 से 60% है ।वैसे यह दुनिया भर में होता है, लेकिन उष्णकटिबंधीय देशों में इसका आघटन ज्यादा होता है। भारत में हर वर्ष 100000 व्यक्तियों में से 5 -10 व्यक्ति इस रोग से मरते हैं ।नवजात शिशुओं की मृत्यु का यह एक प्रमुख कारण है।
 कारण
 इस को फैलाने वाला जीवाणु clostridium tetani है ।यह जीवाणु मिट्टी, खाद, घरेलू पशुओं और मनुष्य की छोटी आंत में पाया जाता है ।घोड़े की लीद ,जंग लगे हुए लोहे में इसके जीवाणु (spores) मिलते हैं ।विदीर्ण  या मिट्टी से सने घाव में या कटे स्थान में यह जीवाणु ज्यादा आसानी से बढ़ते हैं ।लेकिन एक मामूली सी खरोच भी टिटनेस संक्रमण के लिए काफी होती है ।
नवजात शिशुओं में टिटनेस जंग लगे हुए या मिट्टी से सने चाकू या ब्लेड से नाभि काटने के कारण होता है ।पिन या माचिस की तीली से कान साफ करने पर ,महिलाओं के प्रजनन अंगों की जांच दूषित (non sterlizsted) औजार से करने पर तथा गहरी चोट लग जाने पर, यहां तक कि कांटा चुभ जाने पर भी संक्रमण की संभावना रहती है।
 उद्भवन काल (incubation period)--
इस रोग के उद्भवन काल का कम या अधिक होना संभव है ।इस रोग की अवधि दिनों से महीनों तक हो सकती है ।इनक्यूबेशन पीरियड छोटा होने पर रोग की गंभीरता अधिक होती है तथा रोगी के बचने की संभावना कम होती है इसके ठीक विपरीत इनक्यूबेशन पीरियड लंबा होने पर रोग का प्रभाव हल्का होता है तथा रोगी के बचने की संभावना अधिक होती है ।
टेटनस का जीवाणु एक शक्तिशाली "एक्सोटानिक्स" उत्पन्न करता है जो पेसी तंत्रिकाओं के छोर को तथा पेशी तंत्र कोशिकाओं को विशेष रुप से आक्रांत करता है ।पेशी तंत्रिका के छोरों पर क्षोभ होने के कारण पेशियों में आकर्ष होता है।एक्सोटानिक्स पेशी तंत्रिकाओं  के रास्ते ऊपर बढ़ते हुए अग्रश्रृंग कोशिकाओं को आक्रांत करते हैं जिसके कारण तानिक कठोरता एवं आक्षेप होते हैं ।
किसी भी उम्र में किसी भी व्यक्ति को चोट लगने अथवा जलने से होने वाले घाव,आलपिन से दांत खोदने ,संक्रमित सुई से इंजेक्शन लगाने से रोग हो सकता है ।कभी-कभी दांत निकलवाने के कारण या मच्छर काटने से भी हो सकता है ।
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  टिटनेस के लक्षण -
स्थानीय टिटनेस -यह क्षतिग्रस्त स्थान के आसपास की पेशियों तक ही सीमित होता है। यह अक्सर सार्वदैहिक स्वरूप के पहले हुआ करता है।
सार्व दैहिक स्वरूप होने पर-
शरीर के विभिन्न  पेशी समूहों में कठोरता आ जाती है तथा साथ में बेचैनी तथा चिड़चिड़ापन होता है ।फिर भी रोगी अंत तक होश में रहता है। इसमें ज्वर   होना स्थिति की गंभीरता का परिचायक है।
1-सर्वप्रथम चर्वणिका पेशियों में आकर्ष होने के कारण जबड़ा बंद हो जाता है ।रोगी अपना मुंह नहीं खुल पाता। चेहरे की पेशियों में तनाव होने के कारण चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट जैसी छवि बनी रहती है। जिसे Risus sardonicus कहते हैं ।
2-इसके पश्चात गर्दन, पीठ ,पेट तथा हाथ पैरों की पेशियां अक्रांत होती है ।पेट की पेशियों में आकर्ष होने के कारण पेट में कठोरता  आ जाती है ।गर्दन पीठ तथा हाथ पैरों की पेशियों में आकर्ष होने के कारण एक धनुष जैसा आसन बन जाता है ।जिसमें केवल पश्चकपाल तथा एड़ी ही सतह को छू रहे होते हैं। इस स्थिति को पृष्ठ आयाम कहते हैं इसलिए इस ररोगको धनुष्टंकार भी कहा जाता है ।
3-पूरे शरीर में तानिक आकर्ष के वेग कुछ सेकंड या मिनट के बाद लगातार आते रहते हैं ।जो तेज आवाज, रोशनी या अन्य किसी प्रकार की छेड़छाड़ से बढ़ जाते हैं ।यह एक दर्दनाक पस्त कर देने वाली स्थिति होती है ।जो कुछ दिनों तक या कुछ सप्ताहों तक चलती रहती है ।स्वर यंत्र तथा स्वसन की पेशियों में आकर्ष होने के कारण दम घुटने लगता है तथा रोगी की मृत्यु भी हो सकती है ।गंभीर आकर्ष की स्थिति में चूषण निमोनिया हो जाना संभव है। आक्षेप के दौरान जीभ कट सकती है अथवा अस्थियों में फैक्चर हो सकता है। बार  बार आकर्ष होने  से रोगी पस्त  हो जाता है  टाक्सीन प्रायः  शरीर में 3 सप्ताह तक सक्रिय रहता है। पहला सप्ताह समाप्त होते होते बीमारी अपना पूर्ण रूप धारण कर लेती है एवं दूसरे सप्ताह में ऐसे ही रहती है ।अंत में रोगी ठीक हो जाता है अथवा मर जाता है ।रोग के लक्षण जितनी जल्दी शुरू होते हैं , रोगी के ठीक होने की संभावना उतनी ही कम होती है ।
टिटनेस का उपचार 
टिटनेस एक घातक रोग है। रोग होने की दशा में आधे व्यक्ति ही स्वस्थ हो पाते हैं ।इसका उपचार भी विशिष्ट अस्पतालों में ही उपलब्ध है ।रोगी को अलग से अंधेरे व शांत कमरे में रखना चाहिए ।
कटे हुए स्थान या घाव को साफ-सुथरा कर दिया जाना चाहिए ।
टिटनेस से बचने के लिए घाव की देखभाल भी आवश्यक है ।चोट,कटने, जलने ,खरोच के स्थान को अच्छी तरह साफ कर धूल और गंदगी हटाकर घाव पर एंटीसेप्टिक मल्हम लगाकर साफ पट्टी बांधे ।
घाव में मवाद न पड़े इसके लिए एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन करें ।
घाव की सफाई न करने ,उसमें धूल, मिट्टी, गोबर लगने से टिटनेस होने का भय बना रहता है ।चोट ,जलने ,खरोच को अनदेखा न करें।
 टिटनेस के कीटाणु हर स्थान पर हो सकते हैं और त्वचा पर किसी प्रकार का घाव होने पर बीजाणु शरीर में प्रवेश कर रोग उत्पन्न कर सकते हैं।

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