What is constipation,causes,symptoms and treatment

Constipation ( कब्ज) किसे कहते हैं -
हम लोग नित्य जो खाते हैं उसका सार अंश ब्लड  (रक्त  )और असार अंश मल में परिणत होकर रोज निकल जाता है यही प्राकृतिक एवं स्वाभाविक नियम है ।जब ऐसा ना हो कर वही मल बहुत दिनों तक आंतों में रुका रह जाए, रोज न निकल जाए या कष्ट से निकलता हो अथवा बहुत बेग और चेष्टा करने पर थोड़ा निकलता हो तो उसे कब्ज अथवा कोष्ठबद्धता कहते हैं ।
अभ्यास की वजह से कोई कोई मनुष्य नित्य एक बार पाखाना जाते हैं परंतु उससे उन्हें शांति नहीं मिलती दिनभर कुछ ना कुछ अस्वस्थता मालूम होती है इसके अलावा कोई कोई एक दिन का अंतर दे कर कोई कोई 2 या 3 दिन के अंतर से पखाना जाते हैं फिर भी उन्हें किसी तरह की तकलीफ नहीं मालूम होती, मैंने एक वृद्ध को देखा था जो सात 8 दिन के अंतर से 1 दिन पाखाना जाते थे उनका स्वास्थ्य भी कुछ ज्यादा खराब नहीं था करीब 85 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हुई थी जो भी हो अब यह देखना चाहिए कि किस किस कारण से कब्ज होता है ।
कब्ज होने के कारण--
 नित्य अधिक परिमाण में गरिष्ठ चीजें खाने पर और जिनमें जलीय अंश कम हो ऐसे सूखे द्रव्य जैसे मोटी रोटी इत्यादि रोज खाने पर मल सूख जाता है और कष्ट से निकलता है इससे कब्ज होता है।
 गरम मसाले वाली चीजों में पानी का अंश कम रहता है ऐसी चीजें और मांसाहार खाने से कब्ज होता है ।उपवास करने अथवा किसी एक ही तरह की चीज रोज खाने से और केवल गाय का दूध पीकर रहने से भी कब्ज होता है ।
पाखाना लगने पर ठीक उसी समय न जाकर और समय में जाया जाए तो कुछ दिन बाद कब्ज हो जाता है ।बवासीर के रोगी तकलीफ के डर से प्रायः ऐसा किया करते हैं।
 बहुत दिनों तक पतले दस्त आने के बाद अथवा जुलाब लेने का अभ्यास होने पर कब्ज होता है ।anaemia, chlorosis, पक्षाघात आदि बीमारियों में आंतों की पेशी कमजोर पड़ जाती है उससे तथा बहुत ज्यादा मानसिक परिश्रम करने और शारीरिक परिश्रम ना करने पर ,बहुत पसीना और बहुमूत्र आदि रोग में ज्यादा मात्रा में पेशाब होने के कारण ,फेफड़े की किसी बीमारी में बहुत ज्यादा श्लेष्मा निकलने से तथा मस्तिष्क और मेरू मज्जा की बीमारी आदि में भी कब्ज होता है ।
आंतों से बहुत थोड़ा पाचक रस निकलने और पित्तकोष से बहुत थोड़ा पित्त निकलने पर भी कब्ज होता है ।
बाहर के किसी यंत्र में ट्यूमर इत्यादि हो जाता है तो आंतो पर दबाव ,जरायु की वृद्धि या जरायु की अपनी जगह से हटना ,और आंतों के भीतर पथरी ,फल की गुठली या बीज अड़ जाने पर भी कब्ज होता है ।टाइफाइड ,खसरा, चेचक इत्यादि किसी भी नई बीमारी में कब्ज रहे तो रोगी के लिए अच्छा है इसके लिए जुलाब आदि किसी प्रकार की उत्तेजक दवा का भी प्रयोग करना एकदम मना है, उससे विशेष अनिष्ट की संभावना रहती है ।विशेष आवश्यक हो तो मलद्वार में सपोसिटरी का प्रयोग करें ।चेचक की बीमारी में और टाइफाइड में जुलाब देने के कारण बहुत से रोगियों की मृत्यु हो जाती है ।
कभी-कभी कोष्ठबद्धता का कारण बचपन से ही सही आदत न डालना या किसी कारणवश मल त्याग के वेग को बहुधा दबा देना होता है।
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कब्ज के लक्षण --
आंतों के भीतर बहुत दिनों तक मल अड़ा रहने से सड़ना आरंभ हो जाता है, तो एक तरह का विषैला पदार्थ उत्पन्न होकर खून में मिल जाता है और उससे निम्नलिखित लक्षण प्रकट होने लगते हैं--
 सिर दर्द ,आंखों से ऐसा दिखाई देना मानो सामने कुछ उड़ रहा है ,पाचन शक्ति का नाश, भूख ना लगना मुंह का स्वाद बेकार ,जीभ मैली , कलेजे में धड़कन ,चिड़चिड़ा मिजाज, रक्तहीनता, नींद ना आना  इत्यादि।
 इसके अलावा मल बहुत दिनों तक आंतों में पड़ा रहने पर आंतों की हाइपरट्राफी, डाइलेटेशन और सूखा कड़ा मल जमा रहता है तो ,आंतों का प्रदाह,आंतों का घाव और बहुदा आंतों में छेद हो जाता है।
 आंतों में मल अड़ा रहने से बहुधा शिराओं पर भी दबाव पड़ता है ,दबाव पड़ने पर-

हाइपो गैस्ट्रिक वेन पर दबाव पड़ने से- बवासीर होता है 
प्यूविक वेन पर दबाव पड़ने पर --वीर्यक्षय होता है 
इलियक वेन पर दबाव पड़ने पर -पैर का तलवा फूलता है 
सेक्रैल प्लेक्सस पर दबाव पड़ने पर-- स्नायविक दर्द और साइटिका हो जाता है ।
रक्त पर भी इसका दुष्प्रभाव होने से ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है ।
जननेंद्रिय संबंधी अवयवों पर प्रभाव पड़ने से( गैस द्वारा) --स्वप्नदोष का रोग भी हो जाता है
 कब्ज की प्राकृतिक चिकित्सा -
कब्ज की तकलीफ से छुटकारा पाने के लिए बहुत से अनजान मनुष्य प्रायः जुलाब लिया करते हैं उससे पहले तो कुछ समय के लिए फायदा हो जाता है पर अंत में कुछ भी फायदा नहीं होता ।रोगी क्रमशः  जुलाब की मात्रा और परिमाण बढ़ाता जाता है और उस से फायदे के बदले हानि ही ज्यादा होती है जिस दिन जुलाब लिया जाता है उस दिन किसी तरह दो-चार बार दस्त हो जाता है और दूसरे दिन से और भी ज्यादा कब्ज के लक्षण प्रकट होने लगते हैं इसलिए यह अभ्यास एकदम से त्याग देनी चाहिए।
 इस बीमारी में आहार की सुव्यवस्था ,व्यायाम ,औषध सेवन इन तीन विषयों पर अच्छी तरह लक्ष्य रखा जाए तो बहुत कुछ फायदे की आशा की जा सकती है ।कोष्ठबद्धता में प्राकृतिक तरीका ही अपनाएं पेट साफ करने की दवाइयां एवं एनिमा की आदत ना डालें ।उच्च सेलुलोज रेसे वाली जैसे भूसी तथा raw फ्रूट्स एवं शाक लाभकारी होते हैं ।
8 से 10 गिलास द्रव पदार्थ प्रतिदिन लेना चाहिए ।कोष्ठबद्धता के रोगी को दोनों समय नियमित रूप से मल त्याग के लिए जाना चाहिए ।
मल  त्याग के पूर्व एक प्याला चाय या दूध लेने से सुविधा होती है।
 मल त्याग की निश्चित समय को कभी भी नहीं टालना चाहिए ।
कोष्ठबद्धता के रोगी को शीर्षासन एवं सर्वांगासन भी करना चाहिए ।
कोष्ठबद्धता के रोगी को कम चिकनाई वाले आहार जैसे गाय का दूध ,चोकर मिले आटे की रोटी, मौसमी फल का नित्य सेवन तथा भोजन में दाल की अपेक्षा सब्जी ,बथुआ ,पालक आदि शाकों का अधिक सेवन करना चाहिए ।
कोष्ठबद्धता के रोगी के लिए मूली ,गाजर तथा पके अमरूद का सेवन सर्वोत्तम होता है ।
आंतों में खुश्की न हो इसके लिए रोगी को आहार के अतिरिक्त 3 से 4 लीटर जल प्रति दिन लेना चाहिए ।कुछ रोगियों में उनका ,मेदा बहुत सख्त होता है ,उन्हें शौच बहुत कठिनाई से आता है अतः उन्हें रात्रि में एक बड़ा गिलास गर्म दूध में 50 ग्राम  देसी गुड़ मिलाकर पी लेने से चमत्कारी लाभ होता है यह एक लिक्विड थेरेपी का कार्य करता है ।
कब्ज रोगी के लिए एक आवश्यक शिक्षा
 कब्ज के रोगी को मल त्याग की इच्छा को दबाना नहीं चाहिए समय पर मल त्याग के लिए अवश्य जाना चाहिए।

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