High blood pressure kaise hota hai,janiye iske karan aur symptoms

What is high blood pressure

जब किसी व्यक्ति का रक्तदाब सामान्य से अधिक हो जाता है तब उसे उच्च रक्तदाब की संज्ञा दी जाती है ।इस दशा को हाई ब्लड प्रेशर, हाइपरटेंशन- अंग्रेजी नामों के अतिरिक्त परमातति,, अतिरक्त दाब, अतिरिक्त दाब इत्यादि हिंदी पर्याय नामों से भी जाना जाता है ।यह रक्त संवहन संबंधी रोग है ।जब किसी व्यक्ति का रक्त दाब अधिक है यह कहने से पूर्व यह जानना अत्यंत आवश्यक होता है कि स्वस्थ व्यक्तियों में 120- 130 मिली मीटर पारद प्रकुंचन दाब सिस्टोलिक प्रेशर और 80 मिलीमीटर पारद  अनुशिथिलन दाब( डायस्टोलिक प्रेशर) सामान्य माने गए हैं ।मानसिक आवेगों एवं शारीरिक श्रम के अनुसार समय-समय पर रक्तदाब सामान्य से अधिक हो जाया करता है और यह स्वाभाविक भी है ।इस प्रकार अल्प समय के लिए बढ़े हुए रक्त दाब को अति रक्तदाब नहीं कहा जाता है ।जब रक्तदाब स्थाई रूप से अधिक रहने लगता है तब उसे अति रक्तदाब अथवा उच्च रक्तदाब की संज्ञा दी जाती है ।

High blood pressure ke कारण-

उच्च रक्तदाब के अनेक कारण होते हैं जैसे-
 जो व्यक्ति मादक पदार्थ ,चाय-काफी ,नमक आदि का अधिक सेवन करते हैं उनका रक्त भार बढ़ जाता है ।
बहुत से लोगों की दांतों की जड़ों में मवाद एकत्रित हो जाता है अथवा शरीर के किसी अंग में मवाद रहता है तो उसके दुष्प्रभाव से भी रक्त भार बढ़ जाता है ।
रक्त में अनेक विषैले द्रव्य के देर तक बने रहने से भी रक्त भार बढ़ जाता है।
 शरीर में यूरिक एसिड की वृद्धि अर्थात गठिया की प्रवृत्ति होने पर रक्तदाब बढ जाता है ।
धमनियों में काठिन्य योग 50 से 70 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों में होता है। संभवत हाइपोथेलेमस तथा उसके कारण नाडि़यों के उत्तेजित रहने से पहले तो वृक्क की धमनियों में जीर्णता का रोग विशेष रूप से आरंभ हो जाता है ।फिर वृक्क के उपद्रव के रूप में रक्तदाब वृद्धि का रोग हो जाता है ।
इस रोग की उत्पत्ति पैतृक कारणों से भी होती देखी गई है।

Effects and side effects and of vitamins

Infection and diseases
जब थायराइड ग्रंथि किसी कारण से अधिक क्रियाशील अथवा निष्क्रिय हो जाती है तो भी रक्त का भार बढ़ जाता है ।
पिट्यूटरी ग्लैंड की प्रबलता से भी धमनी संकोच होकर इस रोग की उत्पत्ति होती है।
 स्त्रियों में आर्तव समाप्त काल में डिंब ग्रंथियों का श्राव मंद पड़ जाता है फलस्वरूप रक्तदाब बढ़ जाता है ।
वृक्कोचरीय ग्रंथि के कोरटैक्स में कैंसर या अर्बुद होने अथवा कोई आघात हो जाए तो उसके एल्डोस्टेरोन हार्मोन की अधिकता से भी शरीर में लवण एवं जल अधिक रुक जाते हैं जिससे रक्त भार अधिक बढ़ जाता है ।
बड़ी आयु में जब बड़ी धमनियों का लचीलापन कम हो जाता है तो वह हृदय संकोच के समय फैल नहीं पाती हैं जिससे रक्त भार बढ़ जाता है।
 जो व्यक्ति व्यायाम सील नहीं होते हैं अत्यधिक चिंता सील एवं आवेश प्रधान होते हैं उनमें पैरासिंपेथेटिक की अपेक्षा नाडि़यों की प्रबलता रहती है जिससे उनमें रक्तदाब बढ़ जाता है ।
कपाल के अंदर स्थान घेरने वाले किसी रोग से चाहे वह अर्बुद हो या विद्रधि, रक्तदाब बढ जाता है ।
वृक्को के लगभग सभी रोगों में जिनमें वृक्क के बहुत बड़े भाग का नाश हो जाता है, उच्च रक्तदाब उत्पन्न हो जाता है।
 शारीरिक बनावट दिल, वृक्कों के रोग ,ग्लैण्ड्स( अंतः स्रावी ग्रंथियों में )उत्पन्न दोष के कारण इनमें कम या अधिक मात्रा में हार्मोन उत्पन्न होने से अथवा इनके किसी अन्य दूसरे रोगों के कारण भी रक्त दाब बढ़ जाता है।
 जब धमनियों में रक्त का दबाव नॉर्मल से अधिक हो जाता है और बार-बार रक्त भार मापक यंत्र से देखने पर स्थाई रूप से अधिक होने लग जाता है तो यह उच्च रक्तदाब कहलाता है।
Types of high blood pressure

 उच्च रक्तदाब कई प्रकार का होता है धमनियों का दबाव ,हृदय में दोष आ जाने से दबाव, शिराओं का दबाव, बाल जैसी बारीक रक्त वाहिनियों का दबाव आदि ।परंतु अधिकतर धमनियों के तनाव के बढ़ जाने को ही हाई ब्लड प्रेशर कहा जाता है ।

Brain attack
Thyroid
Who is effected by high blood pressure

पुरुषों को यह रोग स्त्रियों की अपेक्षा अधिक होता है। क्योंकि पुरुषों को व्यापारिक एवं सांसारिक कार्यों के कारण हृदय और दिमाग पर चिंताओं ,दुख ,तनाव का प्रभाव बहुत अधिक पड़ता है।
 जो लोग रात दिन बैठे होते हैं, चलने फिरने या परिश्रम का कार्य नहीं करते हैं ऐसे लोग इस रोग से अधिक ग्रस्त होते हैं।

जिन मनुष्यों की अंतडि़यों में सडा़ंध, वायु और विषैले प्रभाव अधिक होते हैं उनके रक्त में विषैले प्रभाव मिल जाने पर यह रोग हो जाता है।
 मधुमेह ,जोड़ों की पुरानी शोथ व दर्द (गठिया)इस रोग का बहुत बड़ा कारण होता है ।

मानसिक प्रभाव, क्रोध, चिंता ,संबंधियों की मृत्यु ,व्यापार में हानि से दुखी रहना ,चिड़चिड़ापन, ईर्ष्या, अधिक समय तक मानसिक कार्य करते रहने से भी ब्लड प्रेशर हाई हो जाया करता है।
 जिन मनुष्य के शरीर में रक्त बहुत ज्यादा होता है और जिनका चेहरा लाल होता है वह भी इस रोग से अधिक ग्रस्त होते हैं ।
रक्त संचार और स्नायु संबंधी रोग, हृदय बहुत बड़ा हो जाना ,पिट्यूटरी ग्लैंड, थायराइड और एड्रिनल ग्लैंड के।  दोष और खराबी से भी यह रोग हो जाता है ।अधिक घी ,दूध, मक्खन, मांस, अंडे ,घी में तली भोजन रात दिन खाते रहने से धमनियों के अंदर इनकी चर्बी की तह जमती चली जाती है इसी को कोलेस्ट्राल कहते हैं इस पदार्थ के जमते जाने से मनुष्य के रक्त वाहिनियां, धमनियां अंदर से तंग और कठोर हो जाते हैं ।उनकी लचक जाती रहती है ।(जैसे रबड़ की ट्यूब पुरानी हो जाने पर उनकी लचक समाप्त हो जाती है और वह टूटने लग जाती है वैसे ही रक्त वाहिनियां कठोर हो जाती हैं )जब उनमे हृदय धक्का लगा कर रक्त प्रविष्ट करता है तो उन में लचक ना होने के कारण वह फैलकर रक्त को आगे धकेल नही सकते ।इस रोग को चिकित्सकीय भाषा में धमनीकाठिन्य कहा जाता है।  इसी रोग से आजकल हाई ब्लड प्रेशर  बहुत  अधिक होता है। मोटे मनुष्यों को उच्च रक्तदाब बहुत अधिक होता है ।
वंशज प्रभाव से उच्च रक्तदाब का रोग छोटी आयु में ही हो जाता है जिनके माता-पिता को यह रोग होता है इस रोग के कारण उनके मस्तिष्क की रक्तवाहिनी फट सकती है अथवा उनको दिल का दर्द (एनजाइना पेक्टोरिस )जैसे भयानक रोग छोटी आयु में ही हो जाते हैं ।वंशज प्रभाव से एक ही कुटुंब के कई कई सदस्यों को और उनके बच्चों तक को यह रोग हो जाता है और होता चला जाता है ।वंश प्रभाव से स्त्री पुरुष दोनों इस रोग से ग्रस्त हो जाते हैं।
 जब मनुष्य की BP यानी ब्लड प्रेशर निरंतर बढ़ता रहता है तो इससे परिणाम यह निकाला जा सकता है कि उस मनुष्य की धमनियों में रक्त संचार ,रक्त वाहिनियां ,वृक्कों अथवा मस्तिष्क में दोष उत्पन्न हो चुका है जिससे रोगी का सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर और डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर दोनों बहुत अधिक हो जाते हैं। परिणाम स्वरुप उसके दिल का बांया वेन्ट्रिकल फैल कर बड़ा हो जाता है।
Symptoms of high blood pressure

यह रोग प्रायः बिना पता लगे प्रारंभ हो जाता है ।काफी समय तक रक्त का दबाव बढे रहने पर भी रोगी को कोई कष्ट या लक्षण प्रकट नहीं होते हैं ।लक्षण काफी समय बाद प्रकट होते हैं इसीलिए वह उनको मामूली रोग समझ लेता है। उसको हाथ और पैरों के अंतिम सिरों में ठंडी सी प्रतीत होती है ।पाचन दोष, भोजन शरीरांश न बनने पालन पोषण से कमी,सांस जोर लगाने पर कठिनाई से आना ,दिल अधिक धड़कना, थोड़ा काम करने पर थक जाना, सिर में दबाव डालने पर दर्द ,सिर के आधे भाग में दर्द कभी कभी सिर मे शोर व आवाजें प्रतीत होना, दृष्टि में दोष उत्पन्न हो जाना, इत्यादि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ।
रक्त का दबाव काफी समय बाद उपर्युक्त लक्षण बढ़ जाने पर सिर भारी,सिर में तड़प और कंपन ,सिर चकराना और घूमता प्रतीत होना, चेहरे में चिंगारियां निकलना ,गर्मी की लहरें प्रतीत होने से चेहरा लाल हो जाना ,दिल के स्थान पर दर्द होना, नींद सी आती प्रतीत होना, काम करने को दिल न करना, हर समय चिंतित रहना, स्नायु में दर्द ,नाक से रक्त आना, रात को बार बार पेशाब होना इसके अतिरिक्त ब्लड प्रेशर बढ़ जाने पर रोगी को सिर के पिछले भाग में दर्द प्रातः समय शुरु होता है कई रोगियों में आधे सिर का दर्द और सिर के दूसरे भागों में भी दर्द हो जाता है। कानों में  आवाजें  आना ,घंटियां बजती सुनाई देना, सिर भारी और भरा हुआ सा महसूस होना तथा कई कई रोगियों का सभी पसीना से भीग जाना, कंपन, चेहरा पीला और मितली होना इत्यादि लक्षण होते हैं ।दौरा के समय BP बहुत बढ़ जाता है। दिल में दर्द होता है अथवा फेफड़ों में पानी जमा हो जाने से सूजन हो जाती है। जिन रोगियों की रक्त में पोटेशियम की बहुत अधिक कमी हो जाती है उनके टखने सूज जाते हैं ।अंगों में पक्षाघात हो जाता है अथवा पेशियां कमजोर हो जाती हैं ।विशेषकर रात में मूत्र बार बार आता है । हृदय के बाएं वेंट्रिकल को  जोर लगाकर कठोर धमनी में रक्त प्रविष्ट करने के कारण रोगी को रात के समय सांस कठिनाई से आता है जिसके कारण वह उठ कर बैठ जाता है अथवा उसको दिल का  दमा (cardiac asthma)रोग हो जाता है।
Previous
Next Post »