Hamare Bhagya ka vidhata kaun hota hai

प्रत्येक व्यक्ति का रहन-सहन अलग -अलग होता है ।उसके क्रियाकलाप अलग-अलग होते हैं ।कोई लखपति है तो किसी के पास खाने के लिए भी पैसे नहीं है ।कोई लाखों रुपए महीने कमा रहा है तो कोई हजार रुपए महीने।
      यह विषमता क्यों ?
इसका तत्काल जवाब है- अपना अपना भाग्य।
       भाग्य !
इस भाग्य ने मनुष्य को जितना गुमराह कर रखा है उतना किसी और बात ने नहीं किया है ।
इस भाग्यवाद की उत्पत्ति कहां से हुई इसका कुछ इतिहास मालूम नहीं पड़ता है पर इतना अवश्य है कि कुछ अ कर्मण्य लोगों ने ही इसका प्रचलन किया होगा।

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 जो व्यक्ति कुछ कार्य नहीं करते, परिश्रम करने से घबराते हैं और जिनकी एकमात्र इच्छा यह रहती है कि उनके पास मुफ्त में सब कुछ चला आए वही भाग्य की बात करते हैं।
" क्या करें यार ।मेरी तकदीर ही ऐसी नहीं है "।
दूसरे को प्रगति करते देख और संपन्न पाकर वह कहते हैं, "उसका भाग्य प्रबल है "
यह भाग्य क्या बला है ?मैं आज तक नहीं समझ पाया हूं ।भाग्य कि जब कोई बात करता है ,तो मुझे लोमड़ी का किस्सा जरूर याद आता है जिसने अंगूर ना पाने के कारण उनको खट्टा कहना शुरू किया था जबकि वह वास्तव में मीठे थे उनको ना पाकर उसने यह मानकर संतोष कर लिया था कि वह खट्टे हैं।
इसी प्रकार भाग्यवादी मनुष्य सब कुछ पाने की क्षमता रखने के बावजूद ,आलस्य के कारण या कामचोरी के कारण भाग्य की बात मानकर पड़ा रह जाता है ।जिसका भाग्य  आप प्रबल मानते हैं उसके गिरेबान में अपना मुंह डालकर देखें तो क्या वह भाग्य के बल पर ही उतना सब पा सका है ?
पूछो उससे देखो उसकी दिनचर्या
रात दिन कितना कठोर श्रम करके उसने अपने आप को इस प्रकार बनाया है ?तब आपको पता चलेगा कि मनुष्य अपना भाग्य अपने हाथ से बनाता है ।
जो कुछ भी उसके पास होता है अपने कर्म और सूझबूझ का फल होता है ।आप ऐसा नहीं कर पाते हैं इस कारण आप की दशा हीन है।
 यह एक ऐसा सत्य है जिसे ईमानदारी की बात यह है कि आप स्वयं स्वीकार करेंगे ।इसलिए सूझबूझ और कर्म की सफलता को अकर्मण्य ईर्ष्यालु लोगों ने भाग्य का नाम दे दिया है ।इस प्रकार भाग्य का प्रचलन हो गया है ।
भाग्य कि इस प्रकार रचना करने के बाद उसका विधाता ईश्वर बना दिया गया ।यह तर्क दिया जाने लगा कि जो कुछ ईश्वर ने भाग्य में लिखा रखा है वही होगा ।आदमी का अपने भाग्य के आगे बस नहीं चलता ।इसके प्रमाण में नाना प्रकार के तर्क भी दिए जाने लगे ।
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इस प्रकार भाग्य के नाम पर एक बहुत बड़ा वर्ग गुमराह कर दिया गया ।मनुष्य ने भाग्य की बात कर अपना प्रगति पथ स्वयं अवरुद्ध कर लिया ।
यह भाग्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है ।भाग्य मनुष्य को कुछ नहीं करने देता है ।उसे अकर्मण्य बना देता है। किसी कार्य में हाथ डालने पर असफलता के कारण यह इस बात को मान लेता है कि भाग्य साथ नहीं दे रहा है ।फिर उस काम में हाथ नहीं लगाता ।काम ही छोड़ देता है ।भले ही उस असफलता के बावजूद उस काम में हाथ लगाए रखने पर सफलता निश्चित हो ।यही पर आदमी सबसे बड़ा धोखा खाता है ।
हीरे की खोज के लिए एक आदमी ने थोड़ी-सी जमीन ली ,जब काफी खुदाई के बाद कुछ हाथ ना लगा उसने छोड़ दी ।दूसरे ने ली ।थोड़ा सा और  खोदने पर उसे एक बड़ा हीरा मिल गया ।
क्या कहेंगे इसे आप ?
भाग्य !
पहले वाला ठेकेदार अपने आलस्य, अपने अकर्मण्यता ,अपनी हड़बड़ी पर इसे भाग्य की संज्ञा दे पर्दा डाल देगा ।
तकदीर में नहीं था
मिलता कैसे ?
जिसकी तकदीर में था, उसे मिला।
 इस प्रकार की धारणाएं केवल निर्बल मन और श्रम तथा संकल्प से डरने वाले लोग किया करते हैं ।भाग्य वास्तव में एक धोखा है व अपनी असफलता पर पर्दा डालने का एक बहाना मात्र है ।अतैव एक भाग्य की बात पर विश्वास करने की सलाह मैं कभी नहीं दे सकता हूं ।हीरे वाले मामले में पहले का निराश हो जाना ,और असफलता को सत्य मान लेना ,अपने श्रम से मुंह चुराना ही उसकी हानि का कारण बन गया ।

एक उदाहरण और देखें --
एक घटना है किसी ने युवती ने, जो अविवाहित थी ,अपने असामाजिक संबंधों के कारण उत्पन्न शिशु को समाज भय से चुपचाप रात की आखिरी पहर में कूड़े के ढेर पर डाल दिया।
 नवजात शिशु जीविता था। हाथ पैर मार रहा था ।सवेरा होते ही राहगीरों की नजर उस पर पड़ गई ।भीड़ लग गई ।एक ईसाई महिला वहां से निकली ।भीड़ देखकर वह अपने कार से उतर आई ।उसने सारा नजारा देखा। हालात को समझा और नवजात शिशु को उठाकर वह चलती बनी । उसने शिशु संरक्षण गृह खोल रखा था ।उसने शिशु को संरक्षण दे में रखवा दिया ।अवैध अनाथ शिशुओं का पालन पोषण करती थी ।जन सहयोग मिलता था ,संतानहीन दंपत्ति उस संस्था में जाते और कोई शिशु पसंद आने पर उसे गोद ले लिया करते थे ।वह नवजात शिशु भी वहां संरक्षण पा गया।
 कुछ समय बाद एक दंपत्ति आए
उन्हें वह शिशु पसंद आ गया।
 उन्होंने उसे गोद ले लिया।
 वह दंपत्ति एक करोड़पति था। इस प्रकार अनायास ही वह शिशु करोड़ों की संपत्ति का उत्तराधिकारी बन गया ।अब इस घटना को आप क्या कहेंगे?
 यह शुद्ध भाग्यवादी घटना मानी जाएगी। ऐसी बात नहीं है ।परिस्थितियां और संयोग इसके कारण थे। वैसे भाग्यवादी इस संबंध में बराबर तर्क कर परिस्थिति और संयोग की भी उत्पत्ति भाग्य से बतला देंगे ।तर्क तो अनंत हैं ,पर भाग्यवादी बनना तो ठीक नहीं है ।
एक प्रश्न आप स्वयं से करें
आपका भाग्य विधाता कौन है?
  जब आप इस प्रश्न पर गंभीरता पूर्वक विचार करेंगे तो आपके अलावा दूसरा व्यक्ति नहीं होगाः ।
तब ....?
इसका अर्थ यह है कि आप अपना भाग्य स्वयं बना या बिगाड़ सकते हैं ।सब कुछ आपके हाथ में है और इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि हम जो कुछ भी हैं या जिस किसी भी दशा से गुजर रहे हैं ,वह सब हमारे कार्यों का ही परिणाम है...
 सोचिएगा जरा। आप स्वयं अपनी वर्तमान दशा या हालात के लिए जिम्मेदार हैं। इसका दोष या श्रेय ईश्वर अथवा भाग्य पर रखकर आप अपनी कमजोरियां छुपाते हैं ।स्वयं को ही धोखा देते हैं ।इस बात को आप मानेंगे ।
तब ईश्वर क्या है ?
एक बार यही प्रश्न 1 व्यक्ति ने बर्टेंड रसेल से पूछा था।रसेल का जवाब था "मन को शक्ति देने वाली इस आध्यात्मिक कल्पना का नाम ईश्वर है "।
ईश्वर का नाम लेकर उस पर विश्वास कर हम मन में शक्ति का एकीकरण कर कार्यरत होते हैं ।हमारा विश्वास मजबूत होता है कि हमारे साथ ईश्वर है। हम इस कार्य में सफल होंगे ।आत्मविश्वास को दृढ बनाने के लिए ईश्वर का अस्तित्व बनाया गया है। इसके ही साथ-साथ ईश्वर की कल्पना मनुष्य को भयभीत भी करती है ।एकांत में भी मनुष्य कोई पाप या गलत काम ना कर सके ,इसी आधार पर उसे सर्वव्यापी ,सर्वद्रष्टा बतलाया गया है। कण-कण में उस का निवास माना गया है ।
मनुष्य नितांत अकेला है ।
कोई पाप कर रहा है।
 अपने एकांत पर उसे पूरा विश्वास है कि कोई नहीं देख रहा है ।ठीक इसी मौके के लिए ईश्वर का अस्तित्व बनाया गया है कि सावधान ,वह देख रहा होगा ।।वह सर्वव्यापी है। तुम्हारी इस पाप को देख रहा है ।मनुष्य को एकांत में भी सुमार्ग पर जाने से रोकने के लिए यह सिद्धांत है ।
वास्तव में यह ठीक भी है ।
मनुष्य पर नियंत्रण रखने के लिए किसी न किसी शक्ति की आवश्यकता तो है ही। इसी आधार पर ईश्वर का निर्माण किया गया और इसी प्रकार असफलताओं को रोकने के लिए ,अपने दोष पर पर्दा डालने के लिए भाग्य का भी निर्माण कर दिया गया है ।
इस प्रश्न का यही उत्तर सही है -
हम स्वयं अपने भाग्य विधाता हैं ।जैसा कार्य हम करेंगे, वैसा फल पाएंगे ।अतएव भाग्य को आप दोष ना दें ।चींटी को देखें। वह कितनी बार चढ़ती गिरती है ।अगर वह भाग्यवादी होती तो फिर  चढ़ ही ना पाती ।निरंतर प्रयास करती है ।
सफल हो जाती है ।
वह भाग्य नहीं ,कर्म करके दिखलाती है।
 इस कारण बराबर कार्य में लगे रहें।सफलता हाथ आए या फिर असफलता ....सफलता पर प्रसन्न होकर अपनी प्रगति को धीमी न करें ।असफलता पर घबराकर या निराश होकर मैदान छोड़कर ना भागे ।अपना कार्य बराबर आगे बढ़ाते रहें।जो उद्यम करते हैं, परिश्रमरत रहें ,निरंतर अपने कदम का ध्यान रखते हैं वह अवश्य जो भी इच्छा करते हैं सब पा जाया करते हैं ।
आप भी अपने को ऐसा ही बनाएं ।सचमुच जब एक बार आप सफलता प्राप्त कर लेंगे तो आप इसका मतलब समझेंगे और फिर आप बराबर प्रगति पथ पर बढ़ सकते हैं ।
अपने भाग्य का आप स्वयं निर्माण करें ।सब कुछ आपके हाथ में है ।संकल्प करें शक्ति लगा दें ।आपको सब कुछ मिल जाएगा ।
आवश्यकता है धैर्य की ,साहस की, समय की।
 जब आप ईमानदारी से इस पर पूरा-पूरा अमल करेंगे तो आप सब कुछ पा सकते हैं ।मनुष्य क्या नहीं कर सकता है ।
ईमानदारी के साथ कभी आपने इस प्रश्न पर सोचा है? देखिए ,विचार कीजिए।
 मनुष्य ही संसार के सभी प्राणियों में एकमात्र ऐसा प्राणी है ,जिसे ईश्वर या प्रकृति ने सब कुछ दिया है ।वह अपने प्राकृतिक गुणों के अलावा भी अपने कौशल के द्वारा औरों के गुण अपना सकता है ।उदाहरण के रूप में केवल मछलियां ही पानी में तैर सकती हैं ,मनुष्य में यह गुण जन्मजात नहीं होता है ।फिर भी वह तैरना सीख लेता है ।उड़ना पक्षियों का धर्म है ,पर मनुष्य भी हवाई जहाज बनाकर उड़ना सीख गया है। इस प्रकार मनुष्य को प्रकृति ने कुछ इस प्रकार का बनाया है कि वह सब कुछ कर सकता है ।अतः जब प्रकृति से प्राप्त सुविधा का लाभ हम स्वयं नहीं उठाते हैं, तो हमारे जैसा मूर्ख और कौन हो सकता है ?
प्रकृति ने हमें सब कुछ दिया है ।
यह हमारी अपनी कमजोरी है कि हम उन सब को पहचान नहीं पाते वरना हम जो कुछ भी चाहते हैं ,वह हमारे आसपास हमारे चारों ओर फिर रहा है ।
अरस्तू ने एक बार चौराहे पर खड़े होकर चिल्ला चिल्ला कर कहा था,- इस दुनिया में सब कुछ है जो चाहो वो पाओ.... पर उस योग्य अपने को बनाओ ।अरस्तू ने ही कहा है ,इस दुनिया में सब कुछ है ।जो कर्म हीन है ,वह नहीं पाते हैं ।
सचमुच यह एक सच्चाई है।
 आपको क्या चाहिए?
 इस पर विचार कीजिए। फिर गंभीरतापूर्वक उसके लिए योजना बनाइए ।।योजना बनाकर उस पर अमल कीजिए ,बराबर प्रयत्नशील बने रहिए। एक दिन आप अपने इच्छा पूर्ति अवश्य करेंगे।
 कैप्टन स्कॉट की बात लें। कोलंबस की बात करें ।एक ध्रुव जाना चाहता था। एक भारत की खोज करना चाहता था। योजना बनाई। जहाज लिया, साथी लिए और चल पड़े । स्काट ध्रुव की ओर गया, कोलंबस समुद्र की लहरों पर। दोनों राह भटक गए ।कोलंबस के साथी भूखे-प्यासे ।कोलंबस वापस लौटने का नाम न ले रहा था ।सब ने उसे मार डालने की योजना बनाई। अगले दिन किनारा दिख गया, सब खुश हो गए ।कोलंबस अमेरिका के किनारे जा लगा।
स्काट राह भूल गए ,स्लेज गाड़ी के कुत्ते मर गए ।।  स्काट वापस नहीं लौटा ।दोनों अपना लक्ष्य पा गए ।एक ने ध्रुव खोजा दूसरे ने अमेरिका ।इसलिए इतिहास के पन्नों पर आज भी उनका गुणगान है ।
आवश्यकता है तो सिर्फ कर्म करने की ।
परिश्रम और साहस की ।
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आप सब कुछ पा सकते हैं ।सब कुछ आपके भाग्य में लिखा है ।
अपने भाग्य विधाता आप स्वयं हैं 
आप अपना भाग्य स्वयं बना और बिगाड़ सकते हैं ।इसलिए मैदान में आइए, बिना संघर्ष ,युद्ध के कुछ नहीं मिलता है ।अगर आपके पास बुद्धि और बल है तो आप सब कुछ पा सकते हैं।
 यह कहावत भी है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस जिसका कर्म उसका फल। आप स्वयं इस पर निर्णय करें ,विचार करें ।आपको सब मिलेगा ।
अपने बलबूते पर आप सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं।
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