Thyroid kya hai aur kaise hota hai

 थायराइड ग्लैंड यानी अवटु ग्रंथि एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण हार्मोन "थायरोक्सिन "  का स्राव करने वाली अंतः स्रावी ग्रंथि है । यह ठुड्डी और गर्दन के बीचों बीच स्थित है। 
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जो सामान्यतः दिखाई नहीं पड़ती है। इसे निगलने की प्रक्रिया के दौरान गले पर हाथ रखकर महसूस किया जा सकता है, क्योंकि यह ग्रंथि निगलने की प्रक्रिया के दौरान ऊपर नीचे घूमती है ।इस ग्रंथ के 2 लोब एक मरू मध्य के द्वारा जुड़े होते हैं ।इस ग्रंथि में आयोडीन नामक तत्व की सहायता से शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए शिशु की गर्भावस्था से लेकर मृत्यु पर्यंत थायरोक्सिन समूह के हार्मोन का निर्माण होता है।

जिसके मुख्य घटक टेट्राआयोडो थायरोनीन (T4) एवं ट्राय आयोड थायरोनीन ( T3) होते हैं ।

सामान्यतः सभी को 200 माइक्रोग्राम आयोडीन की प्रतिदिन आवश्यकता होती है ।थायराइड की बीमारियां अज्ञात कारणों से पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को 4% अधिक होती है। वैसे कोई भी लिंग या आयु का व्यक्ति इसका शिकार हो सकता है ।थायराइड ग्रंथि में बनने व रिसने वाले हार्मोन की मात्रा पर यह मात्रा कम अथवा अधिक या सामान्य होने पर रोगियों में भिन्न-भिन्न लक्षण उत्पन्न करते हैं ।

थायराइड ग्रंथि की किसी भी प्रकार की सूजन या आकार में वृद्धि गलगंड या घेंघा (ग्वायटर ) कहलाती है । यह रोग प्रायः आयोडीन की कमी वाले भागों में होता है ,तथा कई बार यह हार्मोन की सामान्य मात्रा का निर्माण करती है ।यदि हार्मोन की मात्रा कम या अधिक हो तो उसके अनुसार अलग-अलग लक्षण दिखाई देते हैं ,किसी आयु विशेष में गलगंड का रोग होना सामान्य या फिजियोलॉजिकल माना जाता है ।तरुणावस्था में कदम रखते किशोर एवं किशोरियों में होता है ।इसे प्लूयबरटल ग्वायटर कहा जाता है।

यह सामान्यतः बगैर किसी चिकित्सा के ही ठीक हो जाता है ।याद रखें कि ग्वायटर रोग सदैव आयोडीन की कमी से नहीं होता है और ना ही यह सदैव सामान्य ही होता है बल्कि कई बार यह गंभीर स्थिति का भी परिचायक होता है ।यह ग्वायटर  विभिन्न प्रकार के थायराइड कैंसर के कारण से भी हो सकता है ।विशेषकर जब  ग्वायटर से ग्रसित रोगी को भोजन निगलने में तकलीफ हो और थायराइड की सूजन कड़ी और ठोस हो ।
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ऐसी स्थिति में तुरंत ही थायराइड विशेषज्ञ से परामर्श कर इसकी जांच एवं फाइन नीडल इंस्पिरेशन साइकोलोजी से इसका निदान कराना आवश्यक है ।इसके उपरांत परिस्थितियों के अनुसार शल्य चिकित्सा इत्यादि भी करवाई जा सकती है ।इस रोग का एक और कारण है थायराइड का संक्रमण अर्थात इन्फेक्शन ।इस अवस्था को थायराइडाइटिस यानी अवटु शोथ कहा जाता है। इसमें ग्वायटर बहुत ही पीड़ादायक, निगलने में दर्द व बुखार के साथ होता है ।इस दौरान हार्मोन की कमी अथवा अधिकता की चिकित्सा में एंटीबायोटिक तथा एनाल्जेसिक औषधियों का उपयोग होता है तथा ऐसी संक्रमण से आगे जाकर थायराइड कैंसर होने की संभावना रहती है ।ग्वायटर के कारण थायराइड ग्रंथि के अंदर उपस्थित कोलाइड नष्ट होना भी हो सकता है ।सामान्यतः सूई और सिरिंज की सहायता से पानी निकाल देने से ही इस की सूजन खत्म हो जाती है और यह ठीक भी हो जाता है। 
थायराइड ग्रंथि आयोडीन की मदद से पीयूष ग्रंथि द्वारा स्रावित थायराइड स्टिम्युलेटिंग हॉर्मोन टी एस एच के नियंत्रण में थाईराक्सिन समूह के हार्मोन का निर्माण करती है ।यदि बच्चे में जन्म के समय से ही इन हार्मोन की कमी हो तो बच्चे में लंबे समय तक पीलिया बना रहेगा ।इस स्थिति में कर्कश रूदन, अतिनिद्रा, कब्ज तथा स्तनपान करने में कमी इत्यादि लक्षण भी उसमें दृष्टिगोचर होंगे ।यदि यह लक्षण पहचानी नहीं गए और उचित उपचार ना किया गया तो कुछ ही समय के बाद बच्चे में क्रेटिज्मि अर्थात अबटुवामनता के लक्षण उभर आएंगे। जैसे बौना कद ,भद्दे शारीरिक लक्षण ,लंबी बाहर निकली हुई जीभ ,चौड़ी एवं दबी हुई नाक, रूखी सूखी त्वचा ,रूखे व कम घने बाल ,फूला हुआ पेट ,हर्निया ,मंदबुद्धि इत्यादि। वयस्क रोगियों में भी हार्मोन की कमी से सुस्ती ,ठंड सहन न होना, मांसपेशियों का खिंचाव ,हाथों में झुनझुनी ,भूख न लगना ,वजन बढ़ना ,शरीर पर सूजन आ जाना और रूखी त्वचा ,कब्ज तथा महिलाओं में अत्यधिक रक्तस्राव ,बहरापन ,गर्भपात ,बांझपन ,दिल की तकलीफ ,आंतों में रुकावट जैसे लक्षण दिखाई देते हैं ।हार्मोन की अत्यधिक कमी होने पर रोगी के शरीर का तापमान गिरने लगता है तथा वह बेहोशी की स्थिति में आ जाता है, इस स्थिति को मिक्सीडीमा कोमा कहा जाता है। यह हार्मोन की कमी का सबसे भयानक रूप है ।इन सभी स्थितियों का इलाज थायराइड की गोलियों द्वारा किया जा सकता सकता है ।

हार्मोन की अधिकता से उपरोक्त लक्षणों से विपरीत लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं ।जैसे घबराहट, धड़कन चलना, गर्मी सहन न होना, मांस पेशियों की कमजोरी ,अत्यधिक पसीना और नींद की कमी, मासिक रक्त स्राव में कमी ,हाथ पैरों में कंपन, भूख अधिक लगना ,दस्त लगना तथा वजन कम होते जाना इत्यादि इसे हाइपर थायराइडियम कहते हैं। इससे  अधिक बढ़ोतरी होने और इसके लंबे समय तक बने रहने पर आंखें उभरकर बाहर आने लगती हैं ।पलक झपकने की गति कम होने के साथ-साथ आंखों की गति भी कम हो जाती है ।इसे ग्रेप्हज आफ्थल्मोपैथी  यानी नेत्र विकृति कहते हैं ।इसकी चपेट में यदि त्वचा भी आ जाए तो वह भी नारंगी के छिलके के समान लगने लगती है ।उपरोक्त समस्त लक्षण एक साथ होने पर इसे ग्रेहव्ज डिजीज के नाम से जाना जाता है ।वृद्धावस्था में हार्मोन की अधिकता से हृदय के ऊपर विपरीत प्रभाव पड़ सकते हैं और मुख्यतः तीव्र हृदय गति ,अनियमित गति एवं हृदय घात जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।

इस ग्रंथि की बीमारियों एवं सूजन को रोकने के लिए आयोडीन युक्त नमक का उपयोग परम आवश्यक होता है ।थायराइड हार्मोन की कमी से उभरने वाले लक्षणों की चिकित्सा थायराइड हार्मोन की गोलियों से किया जाता है और इन गोलियों का जीवन पर्यंत सेवन करना पड़ता है यह बहुत ही सुरक्षित एवं सस्ती औषधी है किंतु इसके उपचार में थायराइड चिकित्सा विशेषज्ञ परामर्श अति आवश्यक है क्योंकि यह औषधि कभी-कभी हानि भी पहुंचा जाती है ।सामान्यतः इस औषधि का कोई विपरीत प्रभाव नहीं होता है ।
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थायराइड हार्मोन की अधिकता के उपचार के कई तरीके हैं जैसे औषधियों के द्वारा- इस रोग में रोगी को औषधि कुछ वर्षों तक सेवन करनी पड़ती है। औषधि के सेवन से कई बार श्वेत रक्त कणिकाओं की कमी के कारण ल्यूकोपेनिया अर्थात श्वेत कोशिकाल्पता रोग हो जाता है ।अतः समय-समय पर रक्त की जांच कराते रहना बहुत ही आवश्यक है ।कुछ औषधियां हृदय गति को कम करने एवं कंपन कम करने में सहायक होती हैं। ल्यूगोल्स आयोडीन एवं स्टेरॉयड भी आवश्यकतानुसार थोड़े समय के लिए दिए जा सकते हैं ।रेडियो आयोडीन थायराइड ऊतकों को नष्ट करने के काम आती है। इससे थायराइड हार्मोन कम बनने लगते हैं ,परंतु इसका एक और विपरीत प्रभाव यह है कि इससे कुछ वर्षों के बाद थायराइड हार्मोन की मात्रा सामान्य से भी कम हो जाती है। तब विपरीत लक्षण हार्मोन की कमी से उत्पन्न होती है ।इसके लिए थायराइड की टिकिया जीवनपर्यंत सेवन करनी पड़ती है ।यह चिकित्सा विधि बहुधा वृद्ध एवं अधिक आयु के रोगियों के लिए सर्वश्रेष्ठ रहती है ।

शल्य चिकित्सा में थायराइड ग्रंथि का कुछ भाग अथवा अधिकतम भाग निकाल दिया जाता है, जिससे हार्मोन कम बनता है यह विधि उन्हीं परिस्थितियों में प्रयोग में लाई जाती है जब मुख द्वारा सेवनीय औषधियों का प्रभाव ना हो अथवा रेडियो आयोडीन रोगी के लिए अनुकूल न हो। शल्यक्रिया के कारण कई बार रोगी के रक्त में कैल्शियम की कमी होने लगती है जिसकी वजह होती है- शल्य क्रिया के दौरान ग्रंथि के पीछे छिपी पैरा थायराइड ग्रंथियों का निकल जाना ,क्योंकि यही ग्रंथियां रक्त में कैल्शियम की मात्रा नियंत्रित करती हैं ।

उपचार कि प्रत्येक विधि के अच्छे व विपरीत प्रभाव हैं तथा उपचार विधि का निर्धारण- रोगी की आयु, स्थिति ,रोगी में अन्य बीमारियों की उपस्थिति ,रोगी की इच्छा तथा चिकित्सक कि अपने विवेक पर निर्भर करता है ।थायराइड की सभी बीमारियों में घेघा या थायराइड की सूजन का होना आवश्यक नहीं है। घेंघा की उपस्थिति या अनुपस्थिति में भी थायराइड हार्मोन की मात्रा कम ,ज्यादा या सामान्य हो सकती है ।थायराइड ग्रंथि के कैंसर में शल्य चिकित्सा आवश्यक है।
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