Brain attack kaise hota hai iske karan aur symptoms

ब्रेन अटैक ऐसी स्थिति होती है जो मस्तिष्क को शिथिल कर देती है।
 ब्रेन अटैक किसी भी आयु तथा लिंग यानी स्त्री या पुरुष को हो सकता है किंतु बढ़ती उम्र में इसके होने की आशंका अधिक रहती है।
 इस रोग से ग्रसित रोगी को चक्कर आना, लड़खड़ाना, लड़खड़ाते हुए गिर जाना, गर्दन टेढ़ी हो जाना ,मुंह से झाग निकलने लगना, दांतो की किटकिटी तथा ही ही ही की आवाज के साथ मुख बंद हो जाना ,आंखों की पुतलियां ऊपर की ओर चढ़ जाना तथा बेहोश हो जाना इत्यादि प्रमुख लक्षण होते हैं ।
तुरंत उचित उपचार से रोगी के प्राण तो बच जाते हैं किंतु याददाश्त जा सकती है ,रोगी का शरीर अकड़ना, हाथ कंधों की ओर मुड़ जाना, टांगे सीधी हो जाना इत्यादि।

 उपचार के दौरान अर्ध बेहोशी की अवस्था के चिन्ह होते हैं ।प्रायः लोग ऐसी स्थिति को लकवा रोग का अटैक मान बैठते हैं। लकवे में और इस रोग में सबसे बड़ा अंतर यह होता है कि इस रोग से ग्रसित रोगी के शरीर के पैरों में संवेदना पूर्णरूपेण रहता है तथा आधे शरीर में लकवा होने पर 1पैर अवश्य ही संक्रमित हो जाता है ।
यह रोग बढ़ती आयु में अत्यधिक मानसिक परिश्रम तथा सोचना विचारना, अत्यधिक भागदौड़ करने ,शारीरिक थकान और तनाव होने ,रक्तचाप, मधुमेह रोग होने ,मांसाहार का अधिक सेवन करने तथा नशीली पदार्थों का सेवन करने से होता है।


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 अधिकांशत इस रोग का संबंध मस्तिष्क से शुरू होता है ।शुरू शुरू में इस रोग से ग्रसित रोगी कुछ मिनटों में या 24 से 48 घंटों में स्वयं ही सामान्य स्थिति में लौटने लगता है किंतु इस स्थिति को कभी भी सामान्य नहीं समझना चाहिए बल्कि इसका उचित उपचार परम आवश्यक है ।



इस रोग से ग्रसित रोगी  के अत्यधिक गंभीर अवस्था में थोड़ा सामान्य होने पर मस्तिष्क की चिकित्सा विशेषज्ञ द्वारा कैट स्कैन तथा आवश्यकता पड़ने पर एम आर आई करवा कर मस्तिष्क में ट्यूमर का या  क्लोटिंग यानी खून का थक्का इत्यादि विकृतियों की जांच कराते हैं ।जिनके कारण ब्रेन का अटैक हो सकता है ।

उपर्युक्त दोनों जांचों में कोई कमी ना पाए जाने पर ई.ई.जी. कराई जाती है। इन जांचों से मस्तिष्क में हुए परिवर्तनों एवं उसकी मानसिक क्षमता में उत्पन्न व्यवधानों की पुष्टि हो जाती है तथा इससे मस्तिष्क की ध्यानात्मकता का पता लग जाता है।
 ब्रेन अटैक पड़ने का कारण रोगी के मस्तिष्क तक ताजा रक्त ले जाने वाली धमनी में जमा रक्त का थक्का भी हो सकता है जिसके फलस्वरूप रोगी के मस्तिष्क को खून मिलने की क्रिया अवरुद्ध हो जाती है ।

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कई बार देखने में आया है कि धमनियों से खून का प्रवाह रुक जाने से कोशिकाएं मरने लगती हैं और न भरने वाले घाव भी उत्पन्न हो जाते हैं।
 इस समस्या से निजात पाने हेतु विशेषज्ञ चिकित्सक से चिकित्सा अवश्य  ही करानी चाहिए। इस रोग के रोगी की प्रतिदिन ली जाने वाली कुछ दवाएं लगभग 3-4 वर्ष तक लगातार चिकित्सा विशेषज्ञ की देखरेख में लेनी चाहिए ।

रोगी तथा रोगी के परिवार के सदस्यों को सदैव  सावधान रहने की भी आवश्यकता होती है क्योंकि इस प्रकार के अटैक से रोगी अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है तथा इधर-उधर गिरने पड़ने लगता है ।जिसके कारण उसके शरीर में प्रायः चोटें आ जाती हैं तथा शरीर के किसी हिस्से में फ्रैक्चर भी हो सकता है।

 अटैक के समय रोगी अपने दांतो को जोर-जोर से किटकिटाते हैं जिसके फलस्वरूप जीभ भी कट सकती है ।

ब्रेन अटैक के समय रोगी का शरीर झटके खाने शुरू कर देता है ।यह झटके थोड़ी देर के लिए होते हैं ।झटकों की गति काफी तीव्र होती है ,इस अवस्था में कुछ देर के लिए सांस भी रुक जाती है,फिर स्थिति सामान्य होकर रोगी को होश आ जाता है।

 चिकित्सा व सावधानियां----

 इस रोग की चिकित्सा रोग के मूल कारणों के आधार पर मस्तिष्क रोगों के विशेषज्ञ चिकित्सक ही करते हैं ।
अतः यहां चिकित्सा संबंधी औषधियों का वर्णन न करते हुए हम कुछ प्रमुख सावधानियों का वर्णन आपको बता रहे हैं --

रोगी को अटैक होने पर गिरने से बचाने हेतु तुरंत उसे कस कर पकड़े रखना चाहिए तथा घरवालों को घबराना नहीं चाहिए ।जब तक रोगी सुयोग्य चिकित्सक के पास या किसी बड़े अस्पताल तक न पहुंचे तब तक बेहतर हो कि रोगी का करवट देकर लिटा कर रखा जाए ।

अटैक होने पर दांतो के  किटकिटाने के कारण जीभ को कटने से बचाने हेतु रोगी के मुंह में एक साफ कपड़े का टुकड़ा  या रुमाल मोड़ करके अथवा साफ रुई का फाहा रख देना चाहिए। ध्यान रखें ,इस हेतु रोगी के मुंह के अंदर लकड़ी का टुकड़ा या चम्मच आदि ना डालें क्योंकि इनके कारण दांतों के टूटने का भय रहता है ।

अटैक के समय झटके लगने पर या बेहोशी की अवस्था में रोगी को तुरंत करवट देकर सीधा लिटा देना चाहिए ।

धूम्रपान के कारण धमनियों की बीमारियों का भय बढ़ जाता है क्योंकि इनमें उपस्थित मादक द्रव्य धमनी में उत्पन्न थक्कों को बढ़ाने में सहायक होता है ।
धमनी बंद होने पर रोगी की मृत्यु भी हो सकती है इसलिए ऐसे रोगियों को जिन्हें दिमागी दौरे अथवा दिल के दौरे पड़ते हो अथवा रोगी उच्च रक्तचाप यानी हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित हो और जिसकी आयु 35 वर्ष से अधिक हो उसे धूम्रपान तत्काल ही छोड़ देना चाहिए ।

ऐसे रोगी को कभी भी डिप्रेशन का भी शिकार नहीं होना चाहिए ।
 रोगी को अत्यंत थकान की अनुभूति होना, मंद या तेज ज्वर होना, चक्कर आना, भूख न लगना, सिर भारी होना, लगातार सिर दर्द होना अथवा घबराहट होने लगने पर तुरंत ही अपने चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए क्योंकि शरीर के किसी भी जैव रासायनिक क्रियाओं में परिवर्तन आना रोगी के सामान्य ना होने का लक्षण होता है।

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 ब्रेन अटैक होने पर बेहोशी अथवा अर्ध बेहोशी की दशा में रोगी पर पानी ना डालें, इस समय रोगी को पानी पिलाने की भी कोशिश ना करें क्योंकि पानी सांस की नली में भी जा सकता है जो रोगी को तुरंत ही प्राण घातक सिद्ध हो सकता है ।
अटैक के समय रोगी के पहने हुए कपड़े एवं जूते इत्यादि तुरंत उतार देनी चाहिए तथा ऐसी स्थिति में किसी भी प्रकार के जादू टोना ,तांत्रिक क्रियाओं या भूत प्रेत इत्यादि के चक्कर में पड़कर रोगी के प्राणों से खिलवाड़ कदापि नहीं करनी चाहिए।
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