Infections se hone wale diseases

प्रकृति में कोई स्थान ऐसा नहीं है कि जहां पर कीड़े ना हों।
वायु में, हर प्रकार के पानी में ,धरती के ऊपर और धरती के नीचे अर्थात सब जगह कीड़े मिलते हैं ।गर्म और मध्यम जलवायु वाले देशों में यह सर्पदंशों  की अपेक्षा अधिक पाए जाते हैं ।
वैज्ञानिकों ने अब तक लगभग 700000 विभिन्न प्रकार के कीड़ों की खोज की है ,किंतु यह संख्या यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि यह संख्या इससे भी बहुत अधिक है( किंतु खोज अभी तक केवल इनके बारे में ही हो सकी है ) ।
कीड़े के जीवन का मनुष्य के जीवन से गहरा संबंध है। कुछ कीड़े मनुष्य के मित्र होते हैं और कुछ शत्रु। हम चारों ओर से इन कीटाणु से घिरे रहते हैं, जब कभी यह हमारे शरीर के अंदर चले जाते हैं तो वहां तेजी से अपनी उत्पत्ति करने लगते हैं ।इन कीटाणुओं के शरीर में पहुंचने पर हमारे रक्त के श्वेत  कण इन कीटाणुओं के पास आकर, एकत्रित होकर, उनसे लड़ाई करते हैं जमकर  युद्ध होता है। शरीर के दूसरे यंत्र रक्त के सफेद कणों की इस युद्ध में सहायता करते हैं ।औषधि सेवन करना, पथ्य से रहना,  मानो रोग के कीड़ों से लड़ने वाले इन रक्त के सफेद कणों अर्थात सफेद कीड़ों को सहायता पहुंचाना ही है ।
यदि खून के सफेद कीड़े इस युद्ध में जीत जाते हैं तो रोग दूर हो जाता है और इस प्रकार हम धीरे-धीरे स्वस्थ हो जाते हैं, किंतु  रोग के कीड़ों के जीतते जाने और रक्त के सफेद कीडो़ं के हारते चले जाने पर हमारा रोग और भी अधिक बढ़ता चला जाता है। यदि रोग के कीड़े जीतते ही रहे तो अंत में रोगी की मृत्यु भी हो सकती है ।

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Effects and side effects of vitamins

जीवाणुओं को दो भागों में विभक्त किया गया है--
 एक स्थूल  जिनको  हम अपनी खुली आंखों से देख सकते हैं जैसे सांप बिच्छू आदि।
 दूसरे वो जो सूक्ष्म  होते हैं, जो कीट साधारणतया नंगी आंखों से नहीं देखे जा सकते हैं इनको देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी यंत्र की सहायता लेनी पड़ती है। कुछ तो इतने सूक्ष्म होते हैं कि जो अति सूक्ष्म दर्शक यंत्र द्वारा भी नहीं देखे जा सकते हैं ।इनका अस्तित्व अन्य साधनों द्वारा जैसे कल्चर आदि द्वारा जाना जाता है ।इनको रोग के सूक्ष्म अणु यानी वायरस के नाम से जाना जाता है ।यह जीव स्वयं तो हमारे लिए हानिकारक नहीं है परंतु इनमें से कुछ विष उत्पन्न होते हैं ,वह मानव जीवन के लिए रोग उत्पन्न करने वाले होते हैं ।प्राणिज वर्ग के जीवाणु जो रोग को उत्पन्न करते हैं । एक सेल युक्त सूक्ष्म जीव होते हैं जो सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा ही देखे जा सकते हैं ।ऐसे कुछ प्राणी जीवाणु निम्नलिखित हैं ।



1-मलेरिया ज्वर( विषमज्वर )उत्पादक जीवाणु -प्लाज्मोडियम कहलाता है ।
2-कालाजार उत्पादक जीवाणु- लीशमैनिया कहलाता है ।
 3-अमीबीक  प्रवाहिका का जीवाणुु- अमीबा वर्ग का है ।
4-अतिसार का जीवाणु- जियार्डिया लांबलिया होता है 5-उपदंश( सिफि़लिस) उत्पादक जीवाणु -- स्पायरो कीट वर्ग का है ।
वनस्पति वर्ग के कीटाणु- वनस्पति वर्ग के रोग उत्पादक जीवो को कीटाणु कहा जाता है ।यह भी एक सेल से बने हुए होते हैं। यह दो प्रकार के होते हैं दंडाणु एवं कोक्कस।
संक्रमण के मार्ग -
1-त्वचा मार्ग से -मनुष्य के सभी अवयवों पर त्वचा का आवरण एक सुरक्षित कवच है। जो बहुत प्रकार की वाह्य पदार्थों से शरीर की रक्षा करता है। कई रोगों के जीवाणु त्वचा द्वारा शरीर पर आक्रमण करते हैं। ऐसे रोग उत्पादक जीवाणु या किटाणु प्रसंग द्वारा रोग उत्पन्न करते हैं( बहुत समय तक घनिष्ठ संबंध को प्रसंग कहा जाता है ) ।
जैसे शिशु का माता के साथ और पति का पत्नी के साथ घनिष्ठ संबंध रहता है। इस घनिष्ठ संपर्क से कुष्ठ (लेप्रोसी) दाद और त्वचा संबंधी रोग उत्पन्न होते हैं ।कुछ रोग केवल रोगी से स्पर्श करने से उत्पन्न हो जाते हैं जैसे सिफलिस और विसर्प रोग आदि ।
Skin diseases by infection



रोगी के  दूषित वस्त्रों को पहनने से रोग   के कीटाणु या जीवाणु त्वचा द्वारा शरीर पर आक्रमण कर देते हैं। जैसे पामा और  कंडू रोगों में।।
रोगों के जीवाणु ,कीटाणु ,धूल, रेत आदि मे मिले होते हैं और त्वचा पर रगड़ आदि लगने से जब धूल उस रगड़ की जगह पर पहुंचती है तो उसमें स्थित जीवाणुओं का प्रवेश हो जाता है ।जैसे टिटनेस के कीटाणु ।
इसी तरह हुकवर्म के कीटाणु प्रायः खेतों की गीली मिट्टी में रहते हैं और जहां से त्वचा छिल जाती है अथवा चोट से रगड़ खाती है वही त्वचा के छिद्र द्वारा शरीर में प्रवेश कर जाते हैं इस तरह से कुछ रोगों का संक्रमण त्वचा मार्ग से हो जाता है।
2-वायु द्वारा-
 मनुष्य प्रत्येक समय श्वास-प्रश्वास की क्रियाओं का संपादन करता है ।रोगी के गले, नाक एवं श्वास पथ में रोग कारक कीटाणु होते हैं ।जब वह थूकता और नाक साफ करता है तो उस श्लेष्मा में कीटाणु  भी मिले होते हैं ।इस तरह श्वास द्वारा जब ऐसे कीटाणु मानव शरीर में प्रवेश करते हैं तो रोग के कारण बनते हैं ।रोगी के निकट रहने वाले व्यक्तियों विशेषकर परिचारकों ,परिवार के सदस्यों को इस प्रकार से संक्रमण हो जाता है ।जैसे प्रतिश्याय, इंफ्लुएंजा ,निमोनिया ,राज्य क्षमा आदि।
 कीटाणु नासा या ं फेफड़ों में जाकर रोग उत्पन्न कर देते हैं ।इसी प्रकार रोगी के थूकने या नाक छिनकने से कीटाणु मिट्टी में मिल जाते हैं और मिट्टी द्वारा वे कीटाणु वायु के संपर्क से स्वस्थ मनुष्य के शरीर में प्रवेश पा जाते हैं ।जिसके फलस्वरूप रोग उत्पन्न हो जाते हैं ।
3-आहार द्वारा -संक्रमण का तीसरा बड़ा मार्ग आहार द्वारा कीटाणुओं का प्रवेश करना है ।इस तरह का संक्रमण दो प्रकार से होता है ।
प्रथम -अन्न ,पेय इत्यादि खानपान का दूषित कीटाणुओं से युक्त होना जैसे हैजा तथा आंतरिक ज्वर आदि का संक्रमण इसी तरह से होता है।
 दूसरा -ऐसे अर्ध पके  मांस खाने से जिसमें कृमि उपस्थित हो  खान-पान द्वारा रोगों का संक्रमण सदैव रोगी के  या संक्रमण वाहकों के मल मूत्र आदि से दूषित खाद्य पदार्थों से होता है ।

Cycle of viruses


हमारा संतुलित आहार कैसा हो इसकी जानकारी के लिए देखें

Our food

रूग्णावस्था में रोगी के मल मूत्र आदि  में कीट उपस्थित होते हैं तथा रोगमुक्ति किए कई कई दिन या सप्ताह अथवा महीनों बाद तक भी मल मूत्र आदि में कीटाणु होते हैं ।
संक्रमण वाहक ऐसे व्यक्ति को कहते हैं जिसमें रोग के लक्षण उपस्थित न हो किंतु  उसके नासा, कंठ और आंत आदि स्थानों में कीटाणु रहते हों और वहीं से मल, मूत्र ,श्लेष्मा आदि द्वारा बाहर निकल निकल कर रोग फैलाने का साधन बन रहे हो।
 ऐसे मनुष्य या तो रोग से पीड़ित हो चुके हों और रोग के लक्षण समाप्त हो गए हो अथवा कीटाणु उसके शरीर के अंदर प्रविष्ट होकर और वृद्धि पाकर भी रोगी के रोग क्षमता के कारण रोग उत्पन्न करने में असमर्थ होते हैं ।किंतु उनके नासा ,कंठ और आप आदि स्थानों में वास करते हैं।
 ऐसे मनुष्य बहुत भयानक होते हैं। रोगी से तो सावधान रहा जा सकता है तथा उससे बचकर रोग से बचाव किया जा सकता है किंतु इन गुप्त संक्रमण वाहकों से सावधान रहना  असंभव है ।

4-दंश द्वारा -

रोगों के संक्रमण का चौथा प्रमुख तरीका दंशन द्वारा रोग का प्रसार है ।मच्छर ,पिस्सू, खटमल इत्यादि दंशक जंतु एक व्यक्ति का रक्त लेकर उसके कीटाणु को दूसरे व्यक्ति के शरीर में पहुंचाकर संक्रमण प्रसार का कारण बनते हैं ।जैसा कि विषमज्वर  आदि मे होता है ।इन जंतुओं को जो रूग्ण  व्यक्तियों से दूसरे व्यक्तियों तक सूक्ष्म कीटाणुओं को ले जाते हैं मध्यवर्तीन जंतु कहा जाता है।
 विशेष प्रकार के जीवाणु अथवा कीटाणुओं के लिए विशेष प्रकार के मध्यवर्तिन होते हैं जैसे मलेरिया, एनाफिलीज जाति के मच्छर द्वारा फैलता है। प्लेग मूषक की मक्खी द्वारा और कालाजार सैड फ्लाई द्वारा फैलता है।
इन कीटाणुओं का मानव शरीर में प्रवेश करना तथा रोग उत्पन्न कर पाना दो बातों पर निर्भर करता है -प्रथम कीटाणुओं की सफलता और निर्बलता पर तथा उनको प्राप्त होने वाली परिस्थितियों पर और दूसरे रोगी की शक्ति पर
 यदि कीटाणु बलवान होते हैं और उनके लिए क्षेत्र और भोजन अनुकूल होगा तो वह शरीर में प्रविष्ट होकर रोग उत्पादन में सफल हो जाएंगे। यदि शरीर की शक्ति निर्बल होगी तो वह इन को नष्ट कर पाने में सफल ना हो सकेगाऔर शरीर मे रोग पैदा हो जाता है।
 मानव शरीर का यह नियम है कि जब भी बाहर से कीटाणु प्रविष्ट होते हैं तो वह उनके विरुद्ध युद्ध करता है और उन को नष्ट करने का प्रयत्न करता है ।मानव शरीर में रक्त के श्वेत अणु इस कार्य के लिए विशेष विशेष रूप से नियुक्त होते हैं और शरीर की   शेष सारी सैल भी इनकी सहायता करती हैं ।यह सब प्रतिविष बनाती हैं जोकि की कीटाणुओं के विष को नष्ट कर उनको रोग उत्पन्न नहीं करने देती हैं ।
यह सभी कार्य तभी संभव है जब कि कीटाणुओं की शक्ति को मानव की शक्ति पराजित कर दें परंतु जब कीटाणु बलवान होने से नहीं दबते हैं तो वह रोग उत्पन्न करने में सफल हो जाते हैं। मनुष्य की इस रोग नाशक शक्ति को रोग क्षमता यानी इम्युनिटी पावर कहते हैं ।

 एनीमिया संबंधी जानकारी प्राप्त करने के लिए देखें

Anaemia in hindi

कीटाणु शरीर में प्रविष्ट होते ही रोग पैदा नहीं करते हैं प्रत्युत पहले बढ़ते जाते हैं और जब इतने बढ़ जाते हैं कि उनका विष रोग उत्पन्न करने योग्य हो जाए तब रोग पैदा हो जाता है ।
इस प्रकार कीटाणु प्रवेश काल से लेकर रोग उत्पत्ति के काल तक को परिपाक काल यानि इनक्यूबेशन पीरियड कहते हैं।
 रोग उत्पादक सूक्ष्म जंतु रोग उत्पन्न करते हैं ,उनका विधान इस प्रकार होता है-
 सूक्ष्म जंतु समस्त शरीर में विद्यमान ना होकर केवल एक स्थान में होते हैं और वहीं से विष उत्पन्न होकर रक्त में मिल जाता है और रोग के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ।
रोग उत्पादक कीटाणु रक्त में प्रविष्ट होकर भ्रमण करते रहते हैं ।इनकी बृद्धि भी वही होती है, विष भी रक्त के अंदर तथा शरीर की सब सेलो में उत्पन्न होता है।
 दूसरे शब्दों में संक्रमण स्थानीय ना होकर सार्व शारीरिक होता है।
 कीटाणुओं से रोग उत्पत्ति के अनुसार रोग की चार अवस्थाएं मानी गई हैं।
1 -टाक्सीमिया( विष रक्तता)
 2-सेप्टीसीमिया ((पूय उत्पादक कीटाणुओं की रक्त में विद्यमानता )
3 बैक्टीरिमिया (कीटरक्तता)
4-पायीमिया (पूय रक्तता)
जीवाणु की खोज -जीवाणु की खोज आज से लगभग 300 वर्ष पहले सूक्ष्मदर्शी यंत्र के आविष्कार के साथ प्रारंभ हो गई थी ।।
किंतु उस समय तक उनका वर्गीकरण नहीं हो सका था ।रोगाणुओं का स्वरूप 18 50 ईसवी में लुई पाश्चर ने निश्चित किया। इनकी खोजों से संसार भर के वैज्ञानिकों एवं चिकित्सकों के संसार के अतिरिक्त समस्त बुद्धिजीवी वर्ग में खलबली मच गई और सभी रोगों के कारणों की जांच पड़ताल होने लगी तथा भिन्न भिन्न प्रकार के कीटाणुओं की तलाश होने लगी ।रोगों को उत्पन्न करने वाले जीवाणु  खोज निकाले गए ।रोगों के जीवाणु निश्चित हो जाने पर उनको शरीर से मार भगाने के प्रयास प्रारंभ कर दिए गए।
 एलेग्जेंडर फ्लेमिंग ने इन जीवाणुओं की बस्ती उजाड़ने का काम किया ,उन्होंने पेंसिलीन की खोज करके जीवाणु जगत पर कुठाराघात किया। फ्लेमिंग के अथक परिश्रम के परिणाम स्वरुप ही एंटीबायोटिक औषधियां बनाई जा सकी।अब प्रतिदिन नई नई एंटीबायोटिक औषधियां बाजार में आती ही जा रही हैं।


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