Result of different thinking

हम अक्सर अपनी सोच की कसौटी पर दूसरे को कसते हैं, और अपने निष्कर्ष निकालते हैं ऐसे निष्कर्ष अक्सर कोल्हू के बैल की दृष्टि के समान होते हैं ।
यदि हम हर विचार या निष्कर्ष को एक आंख से ही देखें, तो वह हमारी सीमित सोच का परिचायक है। सीमित सोच रखने वाले अपने निष्कर्ष घोषित करते समय यह भूल जाते हैं कि परिवेश, वातावरण ,ज्ञान आदि भिन्न होने पर विचार और परिणाम दोनों बदल जाते हैं।
 परिवर्तन सृष्टि का नियम है। भारतीय परिवेश में पिछले दो दशकों में कंप्यूटर क्रांति ,संचार माध्यमों, बाजारवाद, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की उपस्थिति आदि से हमारे राजनीतिक और आर्थिक वातावरण में बहुत परिवर्तन आए हैं । आज से दो दशक पहले खूबसूरत माल, WhatsApp, Facebook की दुनिया कहां थी।
 तेजी से बदलते परिवेश में युवा सोच का बदलना लाजमी है पर बुजुर्ग सोच इतनी तेजी से नहीं बदली है ।वैसे भी युवा सोच अपनी युवा ऊर्जा और नित नया पाने की चाह में जितनी तेजी से बदलती है इतनी तेजी से बुजुर्ग सोच नहीं बदलती है ।

युवा सोच खतरे उठा सकती है पर बुजुर्ग सोच खतरे उठाने का साहस भी करती है तो बहुत सावधानी के साथ ।बुजुर्ग सोच में अक्सर किंतु, परंतु का महत्वपूर्ण योगदान रहता है ःः। उसके अनुभव उसे छाछ को फूंक-फूंक कर पीने की चेतावनी देते हैं ।
युवा सोच ने यदि दूध से जले होने का अनुभव नहीं लिया है तो वह छाछ को फूंक फूंक कर पीने की सावधानी क्यों बरतेगी।


मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए भोजन का एक अहम योगदान होता है हमारा भोजन किस प्रकार का होना चाहिए इसकी जानकारी के लिए नीचे का लिंक अवश्य पढ़ें
Our food

 सोच का यही विभाजन टकराव उपस्थित करता है।। सोच की एक पक्षीय दृष्टि ही एक दूसरे को समझने का अवसर नहीं देती है ।ऐसे में एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को कोसती रहती है ।
बहुत आवश्यक है समय के अनुसार मानवता मूल्यों से युक्त समाज के विकास के लिए सामूहिक सोच विकसित हो । अक्सर माता पिता सुविधा के नाम पर बच्चों को व किशोरों को विलासिता के साजो सामान तो प्रदान कर देते हैं लेकिन उन्हें सोचने की आजादी नहीं दे पाते हैं। उन्हें यह तो विश्वास होता है कि बेटा या बेटी सड़क पर सही सोच के साथ सुरक्षित कार चलाएंगे लेकिन उन्हें यह विश्वास नहीं होता कि वह अपनी युवा सोच के साथ जीवन की सड़क पर सुरक्षित चल पाएंगे

आज के वर्तमान समय में खासकर नवयुवक एवं नवयुवतियों में शादी और कैरियर यानी नौकरी को लेकर एक भ्रम की स्थिति बनी रहती है इसी संबंध में लिखे गए हमारे लेख को अवश्य पढ़ें जिसका लिंक नीचे दिया गया है

शादी या कैरियर

किसी विषय पर बच्चा यदि अपने तर्क रखता है तो बजाय उनकी बातों को सुनने के हम उन पर अपनी बात मनवाने का दबाव बनाते हैं । उनके तर्क के आगे हम शब्दों का वाण चला देते हैं बहुत हो गया अब तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो तुम्हारे बारे में सोचने के लिए तुम्हारे माता-पिता जिंदा है।
 अक्सर हम युवा सोच पर ताले जड़ने में विश्वास करते हैं। हमारे पास भेड़चाल का ताला है ,IIT में प्रवेश का ताला है ,डॉ बनाने वाला ताला है ,पढ़ोगे तो होगे नवाब वाला ताला है । ऐसे में एक अहंकार भी रहता है कि हमने बहुत दुनिया देखी है ।जीवन जीने की अपने अतीत पूर्ण कसौटी पर हम युवा भविष्य को कसना चाहते हैं, पर भूल जाते हैं कि आज के समय की चुनौती का युवा वर्ग जितनी तिव्रता से अनुभव कर रहा है उससे निपटने के लिए उसमें पर्याप्त ऊर्जा है ।इस उर्जा के चलते वह उग्र हो  सकता है, कमान अपने हाथ में ले सकता है।
हम भूल जाते हैं कि जिस ताले की चाबी नहीं मिलती, उस की चाबी बना ली जाती है ।एक मास्टर 'की 'होता है वह हर ताले को खोल देता है दूसरी तरफ ताले टूटते भी हैं और तभी कुछ अलग कुछ विशेष कार्य संपन्न होते हैं ।ताले टूटे यानी भेड़ चाल से अलग चलने पर ही सिलिकॉन वैली बनी ।ताले टूटते हैं तभी खेलने कूदने वाले नवाब बनते हैं यानी दिग्गज खिलाड़ी बनते हैं ।
किसी विशेष Idea पर काम करने के लिए इंजीनियरिंग छोड़कर फिल्मों में आया व्यक्ति सदी का महानायक बनता है यह आजाद सोच ही है कि कुछ लोग पैरों में तकलीफ होने का रोना रोते रहते हैं ,तो कुछ लोग अपनी परेशानियों पर विजय पाकर हिमालय पर ध्वज लहरा देते हैं ।यह विक्रमादित्य का समय नहीं है कि द्वार मुक्त छोड़े जाए विष को भी अमृत बनाकर पेश करने वाले जादूगर सम्मोहन का जाल फेंक रहे हैं ःः युवाओं के लिए सोच की आजादी तो जरूरी है लेकिन उन्हें भी कोई निर्णय जल्दबाजी में नहीं लेना चाहिए।
 सोच विचार कर ही निर्णय लेने में भलाई है। क्योंकि वर्तमान पर ही उनका भविष्य टिका हुआ है इसलिए सम्मोहन के जाल से बच कर उन्हें अपने लिए सटीक रास्ता तलाशना होगा।
 यह लेखक का स्वयं का विचार है आप अपने विचार को मानने के लिए स्वतंत्र हैं। आज के लिए बस इतना ही
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