Islam me 786 ko pavitr mante hain kyun


  1. अधिकतर देवी देवताओं के मंदिर पहाड़ों पर बने हैं क्या देवी देवता मनुष्यों से दूर रहना चाहते हैं ?_पहाड़ों का क्षेत्र बहुत ही सुरम्य होता है वहां का वातावरण बहुत सुंदर होता है ।पहाड़ी क्षेत्रों में ऊंचे ऊंचे पेड़ और सुंदर पुष्पों से क्षेत्र की सुंदरता और अधिक बढ़ जाती है ।पहाड़ों के ऊंचे टीले आदि देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। ऐसे सुंदर मनोरम स्थान पर देवी देवताओं का वास हो तो दर्शनार्थी (दर्शन करने वाले )का मन उस सुंदर दृश्य को देखकर पहले ही प्रसन्न हो जाता है, उसके बाद मंदिर में प्रवेश करने पर पूर्ण शांति मिलती है ।चहल पहल और पापमय जिंदगी से दूर पहाड़ी क्षेत्र में लोग शांति के लिए जाते हैं ।
  2. देवी देवता मनुष्य से दूर नहीं रहना चाहते बल्कि उन्हें एकांत में बुलाकर शांति प्रदान करने का मार्ग प्रदान करते हैं। जहां चारों तरफ चिल्ल पों होती रहेगी तो वहां देवी देवता का ध्यान या पूजा करने हेतु आप चाहकर भी अपने मन को एकाग्र नहीं कर सकते। मन की एकाग्रता के लिए एकांत स्थान ही उत्तम होता है ।पूर्व काल में ऋषियों महर्षियों ने भी पहाड़ों की कंदराओं में रहकर किया करते थे।
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क्या देवी देवता मंदिरों के अलावा अन्य कहीं नहीं रहते ?_

_देवी देवताओं के लिए मंदिरों की आवश्यकता नहीं होती उनका अंश सर्वत्र विराजमान होता है ।आपने देखा होगा कि नमाज का वक्त होने पर मुसलमान भाई जहां होते हैं उसी स्थान पर चादर या रूमाल बिछाकर नमाज अदा करने लगते हैं ,किसी भी स्थान पर बैठकर अल्लाह के नाम से की जा सकती है और यह बात सभी जानते हैं कि मुसलमान भाई जिसे अल्लाह या खुदा कहते हैं उसी अंतर्यामी को हिंदू जन ईश्वर या भगवान कहते हैं मंदिर या मस्जिद   नास्तिकों में आस्था जगाने का साधन है ।
देवी देवताओं को दान दक्षिणा या आभूषण चढ़ाकर लोग अपनी आस्था प्रकट करते हैं क्या देवी देवताओं को किसी चीज की कमी है उन्हें सिर्फ श्रद्धा चाहिए जिनके पास आप मांगने जाते हैं उन्हें आप क्या देने लायक हैं ,जब आप स्वयं भिखारी हैं तो दूसरों को भिक्षा क्या देंगे ।
क्या चढ़ावा चढ़ाने से देवी देवता प्रसन्न होते हैं और मन की मुरादें पूरी कर देते हैं?__
चढ़ावा चढ़ाने से ना तो देवी देवता प्रसन्न होते हैं और ना ही मन की मुरादें पूरी होती है ।देवी देवताओं को किसी वस्तु की कमी है जो लोग चढ़ावा चढ़ाने जाते हैं ।सोने चांदी हीरे मोती जवाहरात आदि उनकी इच्छा मात्र से ढेर मौजूद हो जाते हैं ।फिर उन्हें इन सभी चीजों से क्या प्रलोभन, चढ़ावा चढ़ा कर लोग अपनी मुरादे मांगते हैं कोई ₹10 चढ़ा कर कामना करता है कि हे भगवान हमें लाखों करोड़ों की संपत्ति दे दो ,कोई सौ रूपये चढ़ा कर मांगता है कि मुझे कार कोठी वाला बना दो ।
अब आप स्वयं विचार करें कि लोग लालच के वशीभूत होकर चढ़ावा चढ़ाते हैं और इतना बड़ा लालच की ₹10 देकर लाखों रुपए मांगते हैं इतना अधिक ब्याज विश्व की कोई बैंक नहीं दे सकती। अब यह बताइए कि देवता लोग आपके कौन से ऋणी हैं जो ₹10 लेकर आपको लाखों देंगे ।
कोई कोई क्रोध में कभी कभी गाली भी देने लगता है कि कितनी बार दर्शन किया और चढ़ावा चढ़ाया लेकिन कुछ नहीं दिया ,कहना है तो कहो कि हे मालिक मैं आपकी सेवा में आया ,आपकी सेवा की अब आपकी जो इच्छा हो करो अन्यथा  वे तुम्हारे ऋणी थोड़े है जो इतना अधिक ब्याज देंगे ।

देवता पत्थरों में क्यों रहते हैं ?
देवता अगर निर्जीव पत्थरों  में ना रहे तो लोग उन्हें थप्पड़ मार मार कर मार डालें क्योंकि हर किसी की इच्छा पूरी  नहीं कर सकते कारण कि एक काम से मान लो कोई काम हो यदि किसी एक का लाभ होता है तो दूसरे का नुकसान जिसका लाभ होगा वह तो प्रसन्न होगा ,किंतु जिसका नुकसान होगा वह क्रोधित होकर लाठी उठा कर उन्हें पीटने लगेगा ।ऐसी ही स्थिति में तो देवता लोगों के  क्रोध का शिकार होकर बेमौत मारे जाएंगे अतः पत्थर में देवताओं का निवास उचित है ।
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लोग देवताओं की मूर्तियों का परिक्रमा करते हैं मूर्तियों की परिक्रमा करने से क्या लाभ है ?
आइए जानते हैं -देव मूर्तियों की परिक्रमा करना अत्यंत फलदायक माना गया है धर्म शास्त्रों के अनुसार जहां पर देवी या देवता की प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति स्थापित होती है या की जाती है उस स्थान के मध्य से कुछ दूरी तक उस शक्ति स्वरुप की दिव्यप्रभा विद्यमान होती है जो दूरी के हिसाब से कम होती चली जाती है मूर्ति की परिक्रमा जितनी अधिक निकट से की जाए उतना ही अच्छा है मूर्ति की परिक्रमा सदैव दाहिनी ओर से करनी चाहिए। अर्थात दाहिनी ओर से बाई ओर का चक्कर लगाना चाहिए जिसे दक्षिणावर्ती कहते हैं प्रदक्षिणा का सही अर्थ यही है ।
उलटी दिशा अर्थात वामवर्ती परिक्रमा कदापि नहीं करनी चाहिए क्योंकि देवी शक्ति की ज्योति मंगल की गति और हमारे अंदर स्थित परमाणुओं में टकराव पैदा होने से हमारा तेज नष्ट हो जाता है ।
श्रद्धालुओं एवं भक्तों को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। शास्त्रों में कुछ देवी देवताओं की निश्चित परिक्रमा का विधान है जैसे भगवान श्रीकृष्ण की तीन परिक्रमा करनी चाहिए, देवी जी की एक परिक्रमा और भगवान शंकर की आधी परिक्रमा का विधान है। प्रश्न उठता है कि भगवान शंकर की आधी परिक्रमा क्यों क्या इसका कोई कारण है ?
बिना कारण के शास्त्रों ने और विद्वानों ने नियम नहीं बनाया है शास्त्रों में लिखा है कि भगवान शंकर की परिक्रमा करते समय जल से अभिषेक किया जाता है और अभिषेक किए गए जल की धार को लांघना वर्जित है ,इसलिए शंकर भगवान की पूरी परिक्रमा न करें आधी परिक्रमा वापस उसी तरह पूरी की जाती है।
 भगवान शंकर की लहरों की गतियां दोनों  ओर होती हैं अर्थात वामवर्ती  और दक्षिणावर्ती भी।  इसलिए इनकी परिक्रमा दोनोओर से की जा सकती है।

---तुलसी की माला धारण करने का क्या कारण है ?धार्मिक दृष्टिकोण से हिंदू धर्म में तुलसी का बहुत अधिक महत्व है तुलसी की पत्तियां पूजा में चढ़ाई जाती हैं ,तुलसी की लकड़ियों की माला गले में धारण करते हैं ।तुलसी माला धार्मिक दृष्टि से बहुत पवित्र मानी गई है पवित्रता के दृष्टिकोण से तुलसी बहुत ही महत्व की है और वेद तथा धार्मिक ग्रंथों से ज्ञात होता है कि तुलसी की माला धारण करने वालों से श्रीहरि प्रसन्न होते हैं ।
इसका एक वैज्ञानिक कारण भी है तुलसी अनेक औषधीय गुणों वाला पौधा है स्नान करते समय माला भीगती है ,तुलसी की माला को स्पर्श करती हुई पानी की बूंदे शरीर के जितने भाग तक पहुंचती हैं वहां तक अपने औषधीय गुणों के कारण कीटाणुरहित कर देती है ।माला की सुगंध नाक के वास्ते शरीर के अंदर प्रवेश करके आंतरिक भाग को भी रोग से बचाती है ।इस तरह वैज्ञानिक दृष्टि से भी तुलसी की माला धारण करना उचित है
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-----क्या चमड़े की बनी वस्तुएं और पवित्र होती हैं ?किसी के घर किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो लोग इकट्ठा होते हैं और हर कोई यही कहता है कि मृतक शरीर  को घर में ज्यादा देर नहीं रखना चाहिए। यह अलग बात है कि साफ शब्दों में नहीं कहता ।जिसके जीवित रहते लोग प्रसन्न रहते हैं उसके मरते ही उसके मृतक शरीर को तुरंत आंखों के सामने से दूर कर देना चाहते हैं ।जिस मृतक शरीर के एक अंश को लोग घर में नहीं रखते जबकि वह जीवित अवस्था में अत्यंत प्रिय होता है, जब प्रिय व्यक्ति के चमड़े को घर में रखना पवित्र नहीं मानते हैं तो अन्य जीव जंतुओं जैसे बकरी भैंस गाय सूअर के चमड़े से बनी वस्तुएं भला क्यों नहीं अपवित्र होंगी ।चमड़े की वस्त्र धारण करके कोई भी धार्मिक कार्य नहीं किया जा सकता अतः धर्म की दृष्टि से चमड़ा अपवित्र है।
 इसका एक वैज्ञानिक कारण भी है अगर ध्यान दिया जाए तो वैज्ञानिक दृष्टि में भी चमड़े की बनी वस्तुएं अपवित्र हैं मरे हुए जानवरों के शरीर से चमड़ा उतार कर आज फैशन की उच्च कोटि की वस्तुएं बनाई जा रही हैं जो विज्ञान की देन है ।
उन वस्तुओं को दुर्गंध रहित बनाने के लिए केमिकल्स का प्रयोग करते हैं लेकिन उन वस्तुओं को प्रयोग में लाने पर पानी में भीगने से बचाया जाता है ,पानी से धुलने पर चमड़े के बने सामान खराब हो जाते हैं उसमें सड़न यानी दुर्गंध आने लगती है जबकि अन्य कोई भी वस्तु पानी से धो कर साफ की जाती है पानी से धोने पर चमड़ा साफ होने के बजाय सड़ने लगता है उसमें वायरस फैल जाते हैं जब ऐसी वस्तु जो पानी से धोने पर स्वच्छ होने के बजाए दुर्गंध फैलाने लगे तो आप ही विचार करें कि क्या ऐसी वस्तु को पवित्र वस्तु की श्रेणी में रखा जा सकता है।

लहसुन या प्याज खाने से क्या होता है--- 
पुराने समय में ऋषि मुनि ना तो स्वयं प्याज लहसुन खाते थे और ना ही अपने शिष्यों को खाने देते थे क्योंकि वह पूर्ण रूप से ब्रम्हचर्य का पालन करते थे और ब्रह्मचर्य पालन करने के लिए लहसुन प्याज ना खाना ही उचित होता है। लहसुन प्याज वैसे भी राक्षसी भोजन में माना जाता है कारण कि इनका प्रयोग लोग मांस मछली में अधिकतर करते हैं ।
इसका एक वैज्ञानिक पक्ष भी है वैज्ञानिक दृष्टि से भी भोजन में प्याज लहसुन का प्रयोग करना अनुचित है क्योंकि यह शारिरीक उत्तेजना बढ़ााते हैं ।जो कि इंसान को इंसानियत से हटाकर हैवानियत की ओर प्रेरित करते हैं उत्तेजना के कारण समाज में अनेक प्रकार की बुराइयां फैलती हैं ,जन्म लेती हैं ।मांस मछली शराब आदि से दूर रहकर समाज में उत्पन्न होने वाली बुराइयों को समाप्त नहीं किया जा सकता तो कम जरूर किया जा सकता है।
हाथ की कलाई में मौली क्यों बांधा जाता है ?
मौली का अर्थ है सबसे ऊपर जिसका अर्थ सिर यानी मस्तक से भी लिया जाता है। त्रिनेत्रधारी भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा विराजमान हैं जिन्हें चंद्रमोली भी कहा जाता है ।शास्त्रों का मत है कि हाथ में मौली बांधने से त्रिदेव यानी ब्रह्मा विष्णु महेश और तीनों महादेवीयां महालक्ष्मी महासरस्वती और महाकाली की कृपा प्राप्त होती है ।महालक्ष्मी की कृपा से धन-संपत्ति, महा सरस्वती की कृपा से विद्या बुद्धि और महाकाली की कृपा से शक्ति प्राप्त होती है ।शरीरविज्ञान के अनुसार त्रिदोष वात पित्त और कफ का भी शरीर पर आक्रमण नहीं होता क्योंकि एक्यूप्रेशर चिकित्सा के अनुसार रक्त का संचार में शीतलता नहीं आती जिससे वात पित्त और कफ होने का भय नहीं होता।
 मौली को शाब्दिक अर्थ में रक्षासूत्र भी कहते हैं जिसमें उक्त देवी या देवता और  अदृश्य रूप में विराजमान होते हैं जिनकी पूजा करके आप रक्षा सूत्र बांधते हैं।


पारद शिवलिंग क्या है ?
पारद की उत्पत्ति महादेव शंकर के बीर्य से हुई मानी जाती है इसलिए विद्वानों ने पारदको साक्षात शिव स्वरूप माना है। शुद्ध पारद संस्कार बंधन करके जिस देवता की प्रतिमा बनाई जाती है वह स्वयं सिद्ध होती है ।
ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता और वास्तु शास्त्र के ज्ञाता भी पारद शिवलिंग का पूजन करना मानते हैं इस शिवलिंग की जिस घर में भी पूजा होती है उस घर में सभी प्रकार की लौकिक और पारलौकिक सुखों की प्राप्ति होती है।
मुस्लिम धर्म के लोग 786 को अति पवित्र मानते हैं क्यों ?
हिंदू धर्म के लोग जब कोई कार्य शुरू करते हैं तो  श्री गणेशाय नमः लिखते हैं या कहते हैं कि इस काम का श्रीगणेश कर रहे हैं जिसका तात्पर्य शुभारंभ से होता है ।हिंदू धर्म में गणेश जी प्रथम पूज्य और सभी देवताओं में पूजा माने गए हैं तथा सभी विघ्न बाधाओं का हरण करते हैं इसीलिए किसी भी कार्य का शुभारंभ श्री गणेश के उच्चारण के साथ करते हैं ।
ऐसा ही मुस्लिम संप्रदाय में 786 अंक का महत्व है इस अंक को अत्यंत सुख और समृद्धि सूचक माना जाता है मुसलमान भाइयों के मकान के दरवाजे पर या उनकी जीप कार स्कूटर या अन्य वाहनों पर 786 लिखा हुआ देखा जा सकता है इतना ही नहीं अगर किसी को पत्र लिखने हैं तो 786 से ही शुरू करेंगे यदि 786 को अंक ज्योतिष की दृष्टि से देखा जाए तो यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंक है ।
ज्योतिष शास्त्र भी

786 की पवित्रता को स्वीकार करता है 786 के अलग-अलग अंको को अंक ज्योतिष के अनुसार जोड़ा जाए तो इस प्रकार 7 प्लस 8 प्लस 6=21 प्राप्त होता है 21 के अंको  को  जोड़ने पर 2+1=3 प्राप्त होता है यह तीन का अंक सृष्टि की तीन महाशक्तियों की ओर संकेत करता है जिन्हें हिंदू धर्म के लोग ब्रह्मा विष्णु और शिव के रूप में जानते हैं सृष्टि की रचना पालन और विनाश ब्रह्मा विष्णु और शिव  के द् वारा होता है ।अतः786 अंक ही नहीं बल्कि अत्यंत पवित्र है ,अतः किसी के कार्य के आरंभ में 786 का उच्चारण करना महान कल्याणकारी होता है।

क्या विवाहित स्त्रियों को सिर पर पल्लू डालना चाहिए विवाहित स्त्रियों के लिए सिर पर पल्लू रखना आवश्यक है क्योंकि विद्वानों का कथन है कि भोजन स्त्री और धन यह तीनों प्रदर्शन की चीज नहीं है इन्हें छुपाकर इसलिए रखना चाहिए कि मान लो आप सूखी रोटी खा रहे हैं और सामने बैठ कर खा रहे हैं तो देखने वाला आपके भोजन को देखकर आप की स्थिति का अंदाजा लगाएगा कि आपकी स्थिति ठीक नहीं है या बहुत अच्छा भोजन है तो वह आपकी संपन्नता का अनुमान करेगा या उसकी भी इच्छा हो कि काश ऐसा भोजन मुझे मिलता तथा स्त्री को छुपाकर इसलिए रखना चाहिए कि स्त्री घर की इज्जत होती है और घर की इज्जत का प्रदर्शन करना उचित नहीं होता ।और धन तो छुपाकर रखने की ही चीज है धन का प्रदर्शन करने पर चोरी का डर बन जाता है लोगों की निगाह आप के धन को हड़पने को लग जाती है और मौका मिलने पर छोड़ते नहीं इसलिए भोजन स्त्री और धन को छुपा कर रखना चाहिए ।
जब तक लड़की की शादी नहीं हुई हो तब तक कन्या कहलाती है। कन्या अपने पिता के घर अपनी जन्म से माता पिता तथा भाई बहन और चाचा चाची आदि के बीच होती है जहां उसे पर्दा डालने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उनके बीच उसका बचपन बीता है किंतु शादी होने के बाद जिस घर में जा रही है वहां सभी चेहरे नए होते हैं यदि वहां सिर पर पल्लू नहीं डालती तो उसकी सास या अन्य लोग यही शब्द पहले कहते हैं कि उसके मां-बाप ने क्या सिखाया है ,कि सिर पर पल्लू नहीं डालती सिर पर पल्लू डालने से स्त्रियों की मर्यादा बढ़ती है ।सिर पर पल्लू रखने वाली स्त्री सम्मान की दृष्टि से देखी जाती है ।
किंतु आज के युग में लोग अपनी भारतीय संस्कृति को भूलकर पश्चिमी सभ्यता में ढलने को आधुनिक फैशन मानने लगे हैं जिससे अनाचार और पापाचार में वृद्धि हो रही है।
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