Manav jivan ke 4 satya

 धर्म ------
धर्म मानव जीवन की आचार संहिता है, जो हमें कर्तव्य पालन की दिशा और प्रेरणा प्रदान करता है या फिर व्यष्टि जीवन को समष्टि में विलीन होने का संदेश देता है ।धर्म को सभी मत-मतांतर सुख की प्राप्ति का माध्यम समझते हैं ।

सभी संप्रदाय उपदेश देते हैं कि विश्व की अति सुंदरतम वस्तु को छोड़कर धर्म धारण करें ।सभी ज्ञानी संत विद्वान चाहे वह किसी धर्म ग्रंथों के मानने वाले हो, यही शिक्षा देते हैं कि धर्म से अच्छी इस संसार में कोई वस्तु नहीं है ।

कुछ विद्वानों का मत है कि धर्म धारण करने से पुरुष देवपुरुष बन जाता है ।गीता ,वेद ,उपनिषद आदि युगों से हमें धर्म की शिक्षा दे रहे हैं ।धर्म का सिद्धांत है- अपने को स्वाधीन रखना ,किसी को दुख  न पहुंचाना ,भूल से भी हिंसा न करना, झूठ न बोलना ,क्रोध ना करना, लालच ना करना आदि।
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 इसी तरह धीरज रखना, मीठे व हितकर बचन बोलना आदि धर्म के सिद्धांत माने गए हैं ।यह सिद्धांत समाज के जीवन को पुष्ट रखने वाले और समाज का उसी तरह पोषण करने वाले हैं जैसे वृक्ष की जड़ में जल डालने से वह हरा भरा फलता फूलता रहता है ।

जिस समय मनुष्य में यह गुण संपूर्ण विद्यमान थे वह सतयुग था ।धीरे-धीरे मनुष्य के स्वभाव व व्यवहार में अंतर आता गया ज्यों ज्यों युग का ह्रारास होता गया ,

उसे त्रेता और द्वापर युग कहा गया ।वर्तमान में मनुष्य के भीतर उत्तम गुणों का अभाव हो रहा है इसलिए हम इसे कलयुग कहने लगे हैं ।धर्म ही विश्व का सर्वश्रेष्ठ जीवन दर्शन है। वह मनुष्य के महत्व और यश को पराकाष्ठा तक पहुंचाता है।

धर्म के अनुसार आचरण करने वाले को इस जगत में अर्थ और सुख प्राप्त होता ही है साथ ही परलोक में भी अभ्युदय और इष्ट की प्राप्ति होती है और अंत में मोक्ष प्राप्त होता है ,

लेकिन साधक को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रारंभ में अवश्य  क्षति उठानी होती है ।जो वस्तु धारणा युक्त अर्थात मनुष्य को संयुक्त रखने वाली हो वही तो धर्म है ।जीवन के कल्याण के लिए धर्म का विधान किया गया है जो मनुष्य नित्य सभी का भला चाहता है मन, वचन ,कर्म से सबके हित में लगा रहता है वही धर्म को जानता है
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Dharmatma-----

Dharmatma वही है जिसकी आत्मा निष्पाप और उसका चरित्र स्वच्छ हो जिसका अंतकरण मलिन है उसे जूही का हार भी जलते हुए अंगार की भांति कष्ट देता है।

भय----

 जीवन क्षणभंगुर है।  Man is mortal.
प्रायः प्राणी को मृत्यु से भय लगता है ।एक वृद्ध लकड़हारा जंगल से लकड़ियां काट कर ला रहा था। शारीरिक दुर्बलता उसे सता रही थी चला भी नहीं जाता था, बाजार बहुत दूर था ,उसने लकड़ी के गट्ठर को सड़क के किनारे रख दिया। लकड़हारे को अपनी कमजोरी पर क्रोध आ रहा था। उसने झूंझलाते हुए कहा कि इस कष्ट से अच्छा था कि मेरा काल आ जाता।  सहसा उसके सामने एक वरिष्ठ युवा खड़ा हुआ ।वृद्ध लकड़हारे ने युवक से पूछा -तुम कौन हो और क्या चाहते हो। युवक ने कहा मैं तुम्हारा काल हूं, अभी-अभी तुमने मुझे याद किया था तो मैं आ गया हूं ।लकड़हारे को अपने वृद्धशरीर का मोह होने लगा ।इसलिए वह बोला ठीक है जब आप आ ही गए हो तो इस लकड़ी के गट्ठर को बाजार तक पहुंचा दो ।
कहने का आशय यही है कि शरीर कितना ही दुर्बल क्यों न हो जाए उसके प्रति मोह  बना ही होता है और मृत्यु से भय सभी को लगता है।
 जीवन में भय के अन्य अनेक कारण भी हैं किंतु मृत्युभय सर्वाधिक व्याप्त है। आज का जीवन निरापद नहीं है पग पग पर भय मंडराता  दिखाई देता है ।इसका मूल कारण यह है हम जिसको अपना मान लेते हैं उसके प्रति मोह उत्पन्न हो जाता है और फिर प्रतिक्रियात्मक रूप से उन्हें खो देने का भय प्रकट हो जाता है ।
वैराग्य शतक में कहा गया है सांसारिक भोगों में रोगों का डर है, अच्छे कुल में उसके पतन का भय बना रहता है, अधिक धन होने पर राजा का भय होता है ,मौन धारण करने से दीनता का भय बना रहता है ,बाहुबली को शत्रु का भय रहता है और सुंदरता में वृद्धावस्था का भय होता है ।
शास्त्रज्ञ को वाद विवाद का भय होता है ,गुणी को दुष्टों का भय है और काया को नाश हो जाने का भय है ।इस प्रकार संसार की सभी वस्तुओं के प्रति मनुष्य में भय व्याप्त रहता है ।हां केवल वैराग्य में निर्भयता है । वैराग्य के लिए सर्वप्रथम 3 तथ्यों को विश्वास के साथ अभ्यास पूर्वक मन में सदैव अध्ययन करना पड़ता है ।जैसे यह  देह ,आत्मा नहीं है यहीं से प्राप्त होती है यही रह जाती है। दिन में जो कुछ भी दृश्य   हैं ,स्वप्न है ।जैसे रात के सपने हानि लाभ नहीं देते वैसे ही यह दिन के स्वप्न आंख मुदने पर टूट जाते हैं ।कामना के बगैर और फल की इच्छा किए बगैर सत्कर्म और नियत कर्म ही करना उचित है।

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Our food

 -----------मित्रता ------
पारंपरिक रिश्तों के कमजोर हो जाने से अब संबंधों का दारोमदार मुख्यतया मित्रों पर है, इसलिए उनका सुविचारित चयन आवश्यक है ।खून के रिश्ते से अधिक पुख्ता वे हैं जो वक्त पर हाथ थाम ले।
 संपन्नता के दौर में  मित्र मंडराने  लगते हैं ।सच्चे मित्र की परख विपत्ति या कठिन दौर में ही होती है -कहावत भी है -धीरज धर्म मित्र अरु नारी आपद काल परखिए चारी।
 जब आप सारी दुनिया को  कुशल दुरूस्त होने का स्वांग करते हैं, तब वह आप के दर्द को भांप जाता है ।उसका आगमन कदापि बोझ नहीं होता, उसका घर कभी सुदूर नहीं होता।
 मित्रता का अर्थ यह नहीं है कि मतभेद नहीं होंगे विद्वान प्लूटार्क ने कहा था मुझे वह दोस्त नहीं चाहिए जो मेरी मुंडी हिलने पर अपनी मुंडी हिला दे ऐसी मेरी परछाई बेहतर कर लेती है ।सही मित्र हमारी रग-रग समझता है उससे अपनी चिंताएं जताई नहीं जाती हमारे लिए जो उचित है उसमें वह सह भागी बनता है ।वह झकझोरता  है की तफरीह के लिए नहीं बीमार मां के पास जाना है, वह बताता है कि शर्ट का बटन टूटा है या जूते का फीता खुला है। सच्चा दोस्त वह नहीं जो लग्जरी गाड़ियां बेशकीमती फोन खरीदने के लिए उकसाए या  कर्ज दें बल्कि इन के लिए मदद देते हाथ पकड़ ले। मित्रता की अथाह शक्ति का आधार ढाई अक्षर का शब्द प्रेम है। जो वह सब करा  सकता है जो किसी पावर के बूते की बात नहीं। इसी शक्ति के दोहन के उद्देश्य से एक पेशेवर ,कारोबारी, सरकारी एक दूसरे का हाथ थामती हैं ।
पूर्व  अमेरिकी अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने कहा था-- कि दोस्ती ही एक मात्र सीमेंट है जो दुनिया को एकजुट रख सकती है ।अमेरिकी पत्रकार रॉबर्ट ब्राल्ट कहते हैं कि मानसिक रोगियों को मनोचिकित्सक की कम मित्र की ज्यादा जरूरत होती है ।
ईमानदार मित्र सबसे नायाब उपहार हैं ।जिन्हें शिकायत है आजकल खरे मित्र नहीं मिलते उन्हें भीतर झांकना चाहिए की चूक कहां हुई ।
आ.र डब्लू इमल्शन की सलाह है पहले स्वयं किसी के अच्छे मित्र बन जाएं ।आज के मुखौटा प्रिय समाज में मित्रों की पहचान में सूज बूझ अपनानी होगी। एक गुलाब आपकी जिंदगी को महका सकता है ।सोच ऐसी हो विनम्रता सभी से, घनिष्ठता कुछ से ,पूर्ण विश्वास 2-3 पर तभी जिंदगी खुशनुमा होगी।
 मनुष्य का एक ही मित्र है धर्म दूसरों को ईश्वर का अंश मानते हुए उनकी भलाई के लिए कार्य करना ही धर्म है यदि कोई व्यक्ति किसी की सेवा करता है तो उसे परम संतोष और विशेष शांति मिलती है सेवा के लिए मनुष्य के मन में सर्वप्रथम यही विचार आने चाहिए कि दुखी व्यक्ति भी अपना है और यदि यह दुखी रहेगा तो मैं भी दुखी रहूंगा यानी जब हृदय में दया और अपनत्व का भाव होगा तभी हम सेवा के लिए तत्पर हो सकेंगे ।किसी को ठंड में कपकपाते हुए देखने पर हमारा शरीर भी उस ठंड को महसूस करेगा तब उस व्यक्ति के लिए कंबल की व्यवस्था करने का भाव हमारे मन में उत्पन्न होगा। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है ।उसके चारों उसके संबंधी और मित्र आदि का समुदाय दृष्टिगोचर होता है। ऐसे में एक दूसरे की मदद करना ही उनका कर्तव्य धर्म है ।खास बात यह है कि सेवा से अहंकार का भी विनाश हो जाता है ।
अहंकार भगवत्प्राप्ति में सबसे बड़ा बाधक है। सेवा का मतलब समर्पण है ,समर्पण किया है -एक बरगद ने ताउम्र लोगों की सेवा की, धूप होने पर  लोग उसकी छाया में बैठते जबकि त्योहारों पर महिलाएं उसकी पूजा करते हैं जब वह बड़ा हो गया तो वह सूखने लगा उसकी जडे भी कमजोर हो गए लोग उसे काटने के लिए कुल्हाड़ी ले आए उस बरगद के पास खड़ा एक नन्हा बृक्ष बोला दादा यह कैसे स्वार्थी लोग हैं जिन्होंने आपकी छाया ली वही आज आप को काटने के लिए खड़े हैं। क्या  आपको गुस्सा नहीं आ रहा है इस पर बूढ़े बरगद ने कहा गुस्सा किस बात का आएगा ।मैं यह सोचकर प्रसन्न    हो रहा हूं कि मैं मरने के बाद भी इनके काम आ रहा हूं। यही समर्पण है कि हर हाल में अपने दिल में परोपकार की भावना रखना ।अब सेवा में विश्वास को समझते हैं। सेवा कई तरह की होती है कई बार व्यक्ति का मन लोभयुक्त होकर सेवा करता है यह सेवा दूसरे से लाभ लेने या फिर नुकसान पहुंचाने के लिए की जाती है यह तामसिक सेवा कहलाती है। लेकिन जो निष्काम भाव से सेवा करता है वह सात्विक होता है जिससे मोक्ष प्राप्त होता है उदाहरण देखिए रामायण काल में जटायु का बलिदान इसलिए महान बन गया है क्योंकि सीता की पुकार सुनकर सामर्थ्य न होते हुए भी उस ने रावण से लोहा लिया और मोक्ष को प्राप्त किया। आज के लिए बस इतना ही
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