Who am i

मनुष्य अपने जीवन में कई पहेलियां हल करता है और उसके फलस्वरूप इनाम भी पाता है ,परंतु इस छोटी सी पहेली का हल कोई नहीं जानता कि "मैं कौन हूं "यूं तो हर एक मनुष्य सारा दिन "मैं ...मैं "कहता ही रहता है ,परंतु यदि उससे पूछा जाए कि "मैं "कहने वाला कौन है तो वह कहेगा कि "मैं कृष्णचंद हूं ....या "मैं "लालचंद हूं... या फिर उसका जो नाम होगा वही बताएगा परंतु सोचा जाए तो वास्तव में यह तो शरीर.का नाम है ।शरीर तो 'मेरा' है "मैं "तो शरीर से अलग हूं ।
बस इस छोटी सी पहेली का प्रैक्टिकल हल न जानने के कारण अर्थात स्वयं को न जानने के कारण आज सभी मनुष्य ,देह -अभिमानी हैंं और सभी काम क्रोध आदि विकारों के वश में हैं तथा दुखी हैं ।
अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मैं शब्द का प्रयोग करता है परंतु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मैं और मेरा का शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है अर्थात मैं शब्द जिस वस्तु का सूचक है वह क्या है ।
आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी बड़ी शक्तिशाली चीजें तो बना डाली है उसने संसार की अनेक पहेलियों का उत्तर भी जान लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओं का हल ढूंढ निकालने में खूब लगा हुआ है परंतु मैं कहने वाला कौन है इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता।
आज किसी मनुष्य से पूछा जाए कि आप कौन हैं अथवा आपका क्या परिचय है तो वह झट से अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो धंधा वह करता है वह उसका नाम बता देगा ।
वास्तव में "मैं "शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता आत्मा का सूचक है ।मनुष्य जीवात्मा और शरीर को मिलाकर बनता है जैसे शरीर पांच तत्व (जल वायु अग्नि आकाश और पृथ्वी )से बना हुआ होता है वैसे ही आत्मा, मन बुद्धि और संस्कारमय होती है ।आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है तथा वह जैसा करती है उसी के अनुसार उस के संस्कार बनते हैं ।
आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटि में निवास करती है जैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु सा दिखाई देता है वैसे ही दिव्य दृष्टि द्वारा आत्मा भी एक तारे की तरह ही दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्ध पद में कहा गया है कि-- भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा ,गरीबाँनू साहिबा लगदा ए प्यारा ।
आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यही हाथ लगाता है जब वह यह कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे हैं तब भी वह यही हाथ लगाता है आत्मा का यहां वास होने के कारण ही भक्त लोगों में यहां ही बिंदी अथवा तिलक लगाने की प्रथा है ।
यहां आत्मा का संबंध मस्तिष्क  से जुड़ा है और मस्तिष्क का संबंध सारे शरीर में फैले ज्ञान तंतुओं से है ।आत्मामा में ही पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिष्क तथा तंतुओं द्वारा  व्यक्त होता है ।आत्मा ही शांति अथवा दुख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते हैं। अतः मन और बुद्धि आत्मा से अलग नहीं है परंतु आज आत्मा स्वयं को भूल कर देह----स्त्री-पुरुष ,बूढ़ा ,जवान इत्यादि मान बैठी है यह देह अभिमान ही दुख का कारण है ।
उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राइवर के उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है उदाहरण देखें----- शरीर मोटर के समान है तथा आत्मा इसका ड्राइवर है अर्थात जैसे ड्राइवर मोटर का नियंत्रण करता है उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियंत्रण करती है। आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है जैसे ड्राइवर की बिना मोटर ।
अतः परमात्मा कहते हैं कि अपने आप को पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर को चला सकता है और अपने लक्ष्य पर पहुंच सकता है अन्यथा जैसे कि ड्राइवर कार चलाने में निपुण ना होने के कारण दुर्घटना का शिकार बन जाता है और कार और उसके यात्रियों को भी चोट लगती है इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नहीं है वह स्वयं तो दुखी और अशांत होता ही है साथ ही अपने संपर्क में आने वाले मित्र संबंधियों को भी दुखी व अशांत बना देता है ।अतः सच्चे सुख व सच्ची शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है ।
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एक महान भूल यह कितने आश्चर्य की बात है कि आज एक ओर तो लोग परमात्मा को माता-पिता और पतित पावन मानते हैं और दूसरे लोग कहते हैं कि परमात्मा सर्वव्यापक है अर्थात वह तो कंकड़ ,पत्थर ,सर्प ,बिच्छू ,सूअर ,मगरमच्छ, चोर और डाकू अर्थात सभी जीवो में है वह अपने परम पावन परम पिता के बारे में यह कहना कि वह कुत्ते मे, बिल्ली में सभी में है यह कितनी बड़ी भूल है यह कितना बड़ा पाप है जो पिता हमें मुक्ति और जीवनमुक्त की विरासत जन्मसिद्ध अधिकार देता है और हमें पतित से पावन बना कर स्वर्ग का राज्य देता है उसके लिए ऐसे शब्द कहना गोवा तमन्ना ही तो है ।
यदि परमात्मा सर्वव्यापी होते तो उसके शिवलिंग रूप की पूजा क्यों होती ,यदि वह यत्र-तत्र-सर्वत्र होते तो वह दिव्य जन्म कैसे लेते हैं, मनुष्य उनके अवतरण के लिए उन्हें क्यों पुकारते ,शिवरात्रि का त्यौहार क्यों मनाया जाता ,यदि मैं अध्यापक होता ज्ञान कैसे देते गीता में लिखे हुए उनके सत्य सिद्ध होते परम पुरुषोत्तम हूं सूर्य के प्रकाश से भी परमधाम का वासी हूं यह सृष्टि एक उल्टा बीच का बीज हूं जो कि ऊपर रहता हूं यह जो मान्यता है कि परमात्मा सर्वव्यापी है इससे भक्ति ज्ञान योग इत्यादि सभी का खंडन हो गया है क्योंकि यदि ज्योति स्वरूप भगवान का कोई नाम और रूप ही ना हो तो उनसे संबंध जोड़ा जा सकता है ना ही उनके प्रति स्नेह और भक्ति प्रदान की जा सकती है और ना ही उनके नाम और कर्तव्यों की चर्चा ही हो सकती है जबकि ज्ञान का तो आज ही किसी के नाम रूप धाम गुण कर्म स्वभाव संबंध उससे होने वाली प्राप्ति तैयारी का परिचय है अतः सब परमात्मा को सर्वव्यापक मानने के कारण आज मनुष्य मनमनाभव तथा मामेकं शरणं व्रज की ईश्वर ग्रह पर नहीं चल सका अर्थात बुद्धि में एक ज्योति स्वरूप परमपिता परमात्मा शिव की याद धारण नहीं कर सकते और उससे स्नेह संबंध नहीं जुड़ सकते बल्कि उनका मन भड़कता है परमात्मा तो चैतन्य है वह तो हमारे परम पिता हैं पिता तो कभी सर्वव्यापी होता नहीं अतः परम पिता परमात्मा को सर्वव्यापी मानने से ही सभी उपस्थित हो गए हैं और उस परमपिता की पवित्रता सुख शांति विवाह से वंचित हो दुखी तथा अशांत है अतः स्पष्ट है कि भक्तों का यह जो कथन है कि परमात्मा तो घट घट का वासी है इसका भी शब्दार्थ लेना ठीक नहीं है वास्तव में घट अथवा विधायको प्रेम एवं याद का स्थान माना गया है द्वापर युग के शुरू के लोगों में ईश्वर भक्ति अथवा प्रभु में आस्था एवं श्रद्धा बहुत थी कोई विरला ही ऐसा व्यक्ति होता था जो परमात्मा को न मानता हो अतः उस समय भावविभोर भक्त यह कह दिया करते थे कि ईश्वर तो घट घट वासी हैं अर्थात उसे तो सभी याद और प्यार करते हैं और सभी के मन में ईश्वर का चित्र बस रहा है इन शब्दों का हाल है या लेना है कि स्वयं ईश्वर ही सब के वीडियो में बस रहा है एक भूल ही है परमात्मा सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है परंतु सर्वव्यापी नहीं
साधना का माध्यम----- जिस तरह समाधि ,स्वप्न ,जन्म ,मृत्यु अत्यंत व्यक्तिगत होते हैं ठीक उसी तरह गहरी नींद भी व्यक्तिगत होती है । जब हम गहरी नींद यानी गाढी़ निद्रा में आते हैं ,तो  मैं और मेरा का लोप हो जाता है दरअसल गहरी नींद के दौरान हमारी व्यक्तिगत चेतना डूब जाती है और हम सब एकरूप हो जाते हैं ,अपने पराए का भेद भी मिट जाता है ।निद्रा ऐसा विलक्षण अनुभव है, जिसमें जानवर का जानवर पन और मनुष्य का मनुष्य पन शेष नहीं होता। निद्रा के आधार पर अद्वैत यानी अपने पराए का भाव समाप्त हो जाने की सिद्धि होती है ।सार यह है कि बहुत से अनुभव निजी या व्यक्तिगत ही होते हैं जो दूसरों को मालूम भी नहीं हो पाते हैं उन सारे अनुभव को टालकर यदि हम जीवन के बारे में सोचें ,तो भले ही जीवन की कुछ समस्याओं का समाधान मिल जाए लेकिन पूर्णता कभी नहीं मिलती है ।इसका मतलब यह है कि समाधि तो मिल सकती है, लेकिन सिद्धि की प्राप्ति नहीं हो सकती है। समाधि से विभिन्न अवस्था सिद्धी  की है ।यूं कहें कि समाधि का शिखर है सिद्धि।
 पर क्या गहरी निद्रा भी एक प्रकार की समाधि है ?इसका उत्तर जानने के लिए पहले हमें निद्रा को समझना होगा।
 हम सब रोज सोते हैं लेकिन सोने का अर्थ क्या है ,सोना यानी किए हुए कार्य की विश्रांति या कई सारे कार्यों को करने के बाद आराम या विश्राम करना ।विश्राम के क्षणों में आगे के कार्यों की तैयारी करना ।इस दृष्टि से तो सोना एक समाधि सिद्ध हुई हमें समाधि के अर्थ को भी समझना होगा समाधि का अर्थ है मन और बुद्धि का परमात्मा में लीन होना ।समाधि यानि ऐसी अवस्था ,जिसमें आत्मा की शक्ति का आविर्भाव हो ।इसके परिणाम स्वरुप आत्मा की शक्ति उभरकर सामने आती है, प्रकट होती है ।समाधि के बाद आत्मशक्ति से अभिभूत मन बुद्धि के प्रभाव से हमारा व्यवहार भी पवित्र हो जाता है ।
निद्रा का यही अर्थ है ।निद्रा के बाद हम अपने कार्यों का निष्पादन और अच्छे तरीके से करने लगते हैं ।जिससे हमारे कार्य अधिक पवित्र हो जाते हैं ,हम उत्साहित होकर काम करने लगते हैं। सच्चे कर्म योगी के लिए निद्रा समाधि के समान है ।सोना यानी 'सोना' ही है जागना तो 'चांदी 'है ।कर्म योगी की  निद्रा  समाधि का रुप ले लेती है ।वह निःस्वप्न होती है उसमे अनेक तरह की अच्छी बुरी इच्छाओं का तो जन्म होता है, लेकिन वह मूर्त रूप नहीं ले पाते हैं ।ऐसी  दृढ़ इच्छायें, जो हमारे सकारात्मक विचारों को मजबूती प्रदान करती हैं, वही टिकती है। ऐसे विचार तमोगुण से प्रभावित नहीं होते, बल्कि साम्यावस्था को प्रेरित करते हैं ।ऐसी निद्रा ही समाधि का रूप लेती है। इस दौरान जागने के बाद निद्रा या तंद्रा का असर नहीं  रह जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि जागृत अवस्था में चित्तत में सतत कोई न कोई भी विचार चक्र चलता रहे। हम सहज होकर सद्विचारों से अपने चित्त का साक्षात्कार कराएं ।यह शुद्ध जागृति का लक्षण है ।यदि कोई ध्यान करता है तो इसका मतलब है कि वह आध्यात्मिक साधना कर रहा है। वैसे देखा जाए ,तो गहरी निद्रा से बढ़कर कोई ध्यान नहीं हो सकता है ।हमारा अपना अनुभव है कि निःस्वप्न  व निर्दोष गाढी़ निद्रा से विचारों का उत्तम विकास होता है ।कुछ लोग मानते हैं कि ध्यान यानी आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश के बाद हमारा चित्त विनाश की ओर नहीं बल्कि विकास की ओर जाता है, ऐसा मानना पूरी तरह से सही नहीं है।
 ध्यान से जो शक्ति प्राप्त होगी उसका सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों किया जा सकता है ।आपने देखा होगा कि बड़े-से-बड़े ध्यानी ने भी दुनिया के लिए विनाशक साधन पैदा किए।
 गहरी नींद ठीक उसी तरह काम करती है जिस तरह खेत में बीज बोकर ऊपर से मिट्टी डाल दी जाए तो बीज दिखाई नहीं पड़ता जबकि अंदर ही अंदर वह विकसित होता रहता है ,जब उसमें अंकुर फूटता है तब पता चलता है कि अंदर कितनी सुक्ष्म क्रियाएं संपन्न हुई ।।।इसी तरह प्रार्थना ध्यान और चिंतन करने वाले मनुष्य पर निद्रा रूपी मिट्टी डाल दी जाए तो जागृत अवस्था में जिन समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता वह निद्रा में हो जाता है ।आपको इस बात का अनुभव जरूर होगा कि कई बार सुबह उठते ही आपने बड़े सुंदर निर्णय लिए होंगे। कभी-कभी विचारों की गहराई में उतरने के बावजूद किसी प्रश्न का जवाब नहीं मिल पाता वह निद्रा की प्रक्रिया में मिल जाता है ।इसका मुझे एक से अधिक बार अनुभव भी हुआ है।
आज के अंक में बस इतना ही 
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