What is lagan,dhairya and sadgun

 लगन और धैर्य न केवल पात्रता को ही उत्पन्न करने में सहायक होते हैं बल्कि संकल्प शक्ति को भी मजबूती दे देते हैं मन को अधिक मूल्यवान व प्रभावशाली बनाते हैं और सफलता को सुनिश्चित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ।
यदि लगन न हो तो नियम और निरंतरता का पालन नहीं हो पाता और यदि धैर्य ना हो तो व्यक्ति घबराकर अथवा निराश होकर साधना अधूरी छोड़ देता है अतः लगन परम आवश्यक है और धैर्य की तो परीक्षा सदैव विषम परिस्थितियों में होती है जैसा कि तुलसीदास जी ने भी कहा है -
धीरज धरम मित्र अरु नारी।
 आपद काल परखिए चारी।

कुंडलिनी शक्ति क्या है


अधीरता वैसे भी सब कामों को बिगाड देती है जल्दबाजी में किए गए काम न केवल प्रायःअसफल होते हैं बल्कि अन्य कामों को भी बिगाड  देते हैं । अथवा अन्य नुकसान भी कराते हैं ,महत्वाकांक्षा की उच्चता फल पाने की शीघ्रता और परिश्रम या लग्न का अभाव अधीरता उत्पन्न करता है दूसरों से प्रतियोगिता की भावना या उनकी उपलब्धियों से ईर्ष्या ग्रस्त  होना और अपने बाहुबल पर भरोसा ना होना इस अधिरता को और भी बढ़ा देता है ।अधिरता से व्यग्रता और अशांति उत्पन्न होती है जिससे विवेक शक्ति ,निर्णय क्षमता ,दूरदर्शिता तथा विश्लेषणात्मक बुद्धि प्रभावित होते हैं परिणामतः गलत निर्णय ले लिए जाने ,भ्रमित हो जाने व स्थिरता खो देने के नतीजे सामने आते हैं _तो गतिहीनता ,अकर्मण्यता व असफलता को सामने लाते हैं ।
योग विद्या में या कुंडलिनी जागरण के मार्ग पर तो जल्दबाजी या अधैर्य शत-प्रतिशत अकल्याणकारी है ।स्टेप बाय स्टेप सीढी दर सीढी आगे बढ़िए ।एक पैर भूमी पर जम जाए तो दूसरा हवा में उठाइए दोनों एक साथ हवा में उठाने की शीघ्रता मुंह के बल नीचे गिरा देने का कारण बन सकती है ।अतः छलांग लगाने की कोशिश हरगिज़ न करें ।हर सीढी ,हर अभ्यास क्रमशः पात्रता को बढ़ाएगा। पात्रता जैसे-जैसे बढ़ेगी शक्तियां वैसे वैसे ही प्राप्त होती चली जाएगी। किंतु सीढियों को लांघने से  बिना पात्रता को बढाए आप प्रगति करने का प्रयास करेंगे जिसके परिणाम में असफलता ,निरासा ,पछतावा, विपरीत फल मिलना अथवा अन्य उपद्रव  होंगे जो घातक भी हो सकते हैं ।लगन ,परिश्रम और कर्मठता की मां होती है ।लगन व्यक्ति में प्रेरणा ,स्फूर्ति, क्षमता व उत्साह बढ़ाती है। लगन के कारण व्यक्ति अपनी सामर्थ्य से अधिक कर जाता है और सामर्थ्य से अधिक कर गुजरने के बाद भी श्नमित नहीं होता,।
 लगन , नियम और निरंतरता को टूटने नहीं देती है। अभ्यास को सदैव गतिशील रखती है साथ ही आशा और विश्वास को भी मजबूत बनाती है ।
नियम ,निरंतरता या अभ्यास का योग विद्या में महत्व क्या है ?यह बताना सूर्य को जुगनू दिखाना होगा। प्रत्येक विद्या अभ्यास से ही सिद्ध होती है और अभ्यास छूट जाने पर कमजोर हो जाती है तभी तो कहा है --
अभ्यास करि च विद्या अथवा
करत करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान ।
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निशान


अलग-अलग सोच के क्या परिणाम होते हैं

 नियम या निरंतरता टूटी और अभ्यास भंग हुआ ।अभ्यास भंग हुआ तो प्रगति ,अवनति में बदल गई ।अतःनियमपूर्वक अभ्यास आवश्यक है। अन्य विषयों के प्रलोभन ,व्यस्तता ,मन न लगना, आलस्य ,प्रमाद श्रम आदि अनेक कारण अभ्यास की निरंतरता में बाधक होते हैं परंतु लगन का पक्का आदमी सभी पर विजय पाता हुआ मन को बस या नियंत्रण में कर के अभ्यास बनाए रखता है परिणाम सफलता व प्रगति के रूप में सामने आता है ।
शुरू में 20 पाउंड का वजन उठाना भी जिसे कठिन लगता हो वह भारउत्तोलक अभ्यास की निरंतरता से ही आखिर में 300 से 400 तक का वजन भी सुगमता से उठा पाता है क्योंकि अभ्यास की निरंतरता शनैः शनैः उसकी पात्रता को उसकी शक्ति और सामर्थ्य को बढ़ाती है ।वही भारोत्तोलक यदि जल्दबाजी में आकर प्रारंभ में ही अधिक वजन उठाने का प्रयास करेगा तो सफल नहीं होगा अपितु अपनी कमर या पैर तुड़वा बैठेगा या नाभि सरकवा बैठेगा।अतः लगन व धैर्य  दोनों का साधक में होना आवश्यक है बल्कि कहिए कि यह एक अति अनिवार्य है।
सद्गुण __एक संवेदनशील मनुष्य हमेशा अच्छा और सकारात्मक ही सोचता है। प्रायः जन्मजात रूप में सभी इंसान अनेक सद्गुणों से युक्त होते हैं। अलग-अलग आयु में मनुष्यों के सम्मुख उभरने वाली जीवन की असहज, कठिन और असाध्य परिस्थितियां उन्हें उनकी मूल्य चेतना वह स्वभाव से विमुख कर देती हैं ।इन परिस्थितियों में यदि कोई इंसान अपने मूल स्वभाव और मानवीय सद्गुरु के साथ डटा रहता है तो उसका जीवन न केवल उसके लिए बल्कि जीवन के सहज मार्ग से भटके हुए दूसरे लोगों के लिए भी विशाल प्रेरणास्रोत बनता है। यदि मनुष्य हारी-बीमारी में भी अपने विनयी,सदाचारी ,दयालु, प्रेमी ,करुणामई, परोपकारी ,संयमित और मानवीय भावों से पूर्ण व्यवहार को नहीं छोड़ता तो फिर दुनिया में कोई भी कष्ट उसे कष्ट प्रतीत नहीं होता ।इस विशिष्ट गुणों को धारण करने वाले इंसानों के जीवन में मुश्किलें आती भी हैं पर उन्हें विचलित किए बिना खत्म भी हो जाती हैं।
 इस तरह व्यक्तित्व में समाहित प्राकृतिक सद्गुणों के साथ अपनी आत्म चेतना को संजीवित रखकर हम किसी भी तरह की जीवन परिस्थिति में हंसते खेलते समायोजित हो जाते हैं ।मानव जीवन का यह गुण सबसे महान गुण है हालांकि जन्म लेने के साथ ही सभी व्यक्तियों के पास इस तरह जिंदगी को जीने की आत्मा व्यवस्था तो होती ही है परंतु अनेक व्यक्ति कठिनाइयों के समय अपने व्यक्तित्व के सद्गुणों को भूलकर दुर्व्यवहार करने लगते हैं ।व्यक्तित्व के आधार पर मनुष्य के ज न्मजात गुण सभी में विद्यमान होते हैं। कोई भी किसी भौतिक अभाव के कारण यह नहीं कह सकता कि उसके पास सद्गुणों का अभाव है ।अमीर हो या गरीब सभी के पास व्यक्तित्व के गुणों की प्राकृतिक संपत्ति तो होती ही है आवश्यकता मात्र इतनी ही है कि जीवन के दुख पूर्ण और कष्टसाध्य समय में ऐसे गुणों का निरूपण व्यक्ति स्वयं में किस दक्षता के साथ कर सकता है ।ईश्वर ने मनुष्य को इसीलिए विशेष बुद्धि प्रदान की है ताकि वह सांसारिक समस्याओं के मध्य कुंठित ,भ्रमित और विचलित ना होकर अपने गुणों की सहायता से सदैव स्थिर रहे ।
वास्तव में सद्गुण एक ऐसी पूंजी है जिसका कभी क्षय नहीं होता ।याद रखें विपत्ति में सद्गुरु ही काम आते हैं। गुण पूजनीय तब बनते हैं जबकि मनुष्य के जीवन में विचार और आचरण का समन्वय होता है। इसके लिए कठोर साधना करनी  होती है ।वस्तुतः किसी मार्ग को पकड़कर उस पर चलते जाना साधना नहीं है ।धन सत्ता और भोग के पीछे आंख मूंदकर दौड़ने वालों की संख्या कम नहीं है उनकी इस दौड़ को साधना नहीं कहा जा सकता। साधना सदा उच्च आदर्शों की उपलब्धि के लिए की जाती है ।
महावीर ने साधना की थी गौतम बुद्ध ने साधना की थी ।उन्होंने राजपाट का मोह छोड़ा, घर बार का त्याग किया और सारी वैभव को ठुकराकर उच्चतम लक्ष्य की प्राप्ति करने का प्रयास किया जिसकी प्राप्ति के बाद पाने को कुछ भी शेष नहीं रह जाता। भारतीय संस्कृति गुणों की खान है ।हमारे यहां हमेशा इस बात पर जोर दिया गया है कि मनुष्य हर तरह से शुद्ध रहे। संयम से जीवन जिए ।तप और साधना से जीवन को चमकाए। गुण की सर्वत्र पूजा होती है आज इसकी ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
 आज मानव मूल्यों का पतन हो रहा है भौतिक मूल्य चारों ओर छा गए हैं यही वजह है कि नाना प्रकार की विकृतियों से मानव समाज और राष्ट्र आक्रांत हो गया है ।इंसान का अपना प्रिय संगीत टूट रहा है वह अपने से ,अपने लोगों और प्रकृति से कट रहा है उसका निजी एकांत खो रहा है ।और सामाजिकता भी कहीं गुम होती जा रही है कहां है वह जीवन जिसे हमने जीने में ही खो दिया। फिर भी हमें उस जीवन को पाना है जहां इंसान आज भी पूरी ताकत ,अभेद्य जिजीविषा और अथाह गरिमा  के साथ जिंदा है। आज मानवता ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहां उसके आगे का रास्ता अंधेरी सुरंग से होकर गुजरता है ,लगता है जैसे स्वार्थ इस युग का गुण बन गया है ,भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार हो गया है। उसी की आराधना में सब  संलिप्त हैं ।यह देखते हुए कि हम पतन की ओर जा रहे हैं अपनी गति और मति को हम रोक नहीं पाते ।जीवन भार बन गया है।

रात को झाड़ू नहीं लगाना चाहिए क्यों

 इस स्थिति से उबरने का एक ही मार्ग है वह यह कि हम अपने अंतस को टटोलेंं, अपने भीतर के काम ,क्रोध, लोभ ,मोह आदि दुर्गुणों को दूर करें और उस मार्ग पर चलें जो मानवता का मार्ग है हमें समझ लेना चाहिए कि इस धरा पर मानव जीवन बार-बार नहीं मिलता और समाज उसी को पूजता है जो अपने लिए नहीं दूसरों के लिए जीता है
आज के लिए इतना ही 
Previous
Next Post »