What is social responsibility

 जय श्रीराम जय श्रीश्याम मै ना कभी भूलू तुझे
इंसान समाज में रहता है इसलिए समाज ने उसके कुछ दायित्व भी तय कर दिए हैं हालांकि समाज हमसे कोई विशेष कार्य की मांग नहीं करता है बल्कि जो कुछ हमें समाज से प्राप्त होता है उसे ही हमें किसी न किसी रूप में समाज को वापस करना होता है ।


अवसर और सफलता क्या है

मनुष्य को कभी भी यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि उसका अस्तित्व समाज से ही है समाज का अस्तित्व उससे नहीं है जो मनुष्य समाज से अलग थलग हो कर चलता है उन्हें जीवन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है जबकि जो व्यक्ति समाज के साथ मिलकर चलता है उसकी बड़ी से बड़ी समस्या तक मिनटों में हल हो जाती है इसका कारण यह है कि सामाजिक होने के कारण ही प्रत्येक व्यक्ति हमारी समस्या चिंता का निदान खोजने की कोशिश करता है प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर जनहित के बारे में और लोक कल्याण के बारे में सोचें जब हम दूसरों के बारे में सोच कर कोई काम करते हैं तो हमें इस का दोहरा लाभ मिलता है हमें आत्म संतुष्टि का एहसास होता है जबकि ऐसा करके हम अपने भविष्य के कष्टों को भी काटते या उनके प्रभाव को कम करते हैं यदि किसी ने अपने जीवन का तीन चौथाई हिस्सा गलत कार्यों में खर्च कर दिया तो भी अंत में जनहित के कार्य करके पश्चात कर सकता है अर्थात अंत भला तो सब भला जनहित के कार्य करने के लिए मनुष्य को केवल एक छोटा सा प्रयास करना होता है दुख दर्द सभी के जीवन में है लेकिन जो व्यक्ति अपने दुखों को ही सबसे बड़ा मान लेता है उस से जनहित के कार्य करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती इसके विपरीत जो दूसरों के दुख महसूस करें उनके सामने अपने दुख को भूल जाए वास्तव में वही जनहित के बारे में सोच सकता है आशा है  कि आप हमारे आज के इस लेख को पढ़कर अपने जीवन में उचित बदलाव करेंगे और लोगों के प्रति अपने नजरिए में भी बदलाव करेंगे  जिससे आपका जीवन भी धन्य होगा और दूसरों का भी उपकार होगा ।



बच्चों की अनदेखी के क्या परिणाम है

मनुष्य के जीवन में सुख दुख की भूमिका-- मनुष्य का अंतिम  ध्येय सुख नहीं ,बल्कि ज्ञान है। सुख और आनंद का एक न एक दिन अंत हो जाता है इसलिए यह मान लेना कि सुख ही चरम लक्ष्य है ,मनुष्य की भारी भूल है संसार में सब दुखो का मूल यही है कि मनुष्य अज्ञानतावश यह समझ बैठता है कि सुख ही उस का चरम लक्ष्य है ।
कुछ समय बाद उसे यह बोध होता है कि जिसकीओर वह जा रहा है वह सुख नहीं ,बल्कि ज्ञान है ।सुख और दुख दोनों ही महान शिक्षक हैं। जितनी शिक्षा उसे सुख से मिलती है ,उतनी ही दुख से भी ।सुख और दुख का प्रभाव हमारी आत्मा पर पड़ता है। यह हमारे मन पर भी अनेक प्रकार के चित्र अंकित करते जाते हैं ।इन चित्रों या संस्कारों की समस्टि के फल को ही हम मानव का चरित्र कहते हैं। यदि हम किसी मनुष्य का चरित्र देखें ,तो प्रतीत होगा कि वास्तव में वह उसकी मानसिक प्रवृत्तियों और मानसिक झुकाव का ही परिणाम है ।
साथ ही हम यह भी देखते हैं कि उसके चरित्र गठन में सुख और दुख दोनों ने ही एक समान रूप से भूमिका निभाई है ।चरित्र को एक विशिष्ट ढांचे में ढालने में अच्छाई और बुराई दोनों का समान अंश होता है ।कभी-कभी दुख, सुख से भी बड़ा शिक्षक हो जाता है।। यदि हम संसार के महापुरुषों के चरित्र का अध्ययन करें तो ,अधिकांश दशाओं में हम पाते हैं कि सुख की अपेक्षा दुख ने, और संपत्ति की अपेक्षा दरिद्रता या कहें की कमी ने ही  उन्हें अधिक शिक्षित किया है। प्रशंसा की अपेक्षा निंदारूपी आघात ने
 उसकी अंदर की   ज्ञानाग्नि को अधिक प्रज्वलित किया है ।समस्त ज्ञान, चाहे वह व्यवहारिक हो या सैद्धांतिक ,मनुष्य के मन में ही निहित है । अक्सर यह ह में दिखाई नहीं देता है, बल्कि ढका रहता है। जब आवरण धीरे-धीरे हटता जाता है ,तो हम कहते हैं कि "हमें ज्ञान हो रहा है "।


अलग-अलग सोच के क्या परिणाम होते हैं

 आवरण हटने की क्रिया ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है ,त्यों त्यों हमारे ज्ञान की वृद्धि होती जाती है । जिस मनुष्य पर से यह आवरण उठता जाता है  वह अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक ज्ञानी हो जाता है । जिस मनुष्य पर यह आवरण परत-दर-परत पड़ा है ,वह अज्ञानी के समान है ।जिस मनुष्य  पर से यह आवरण  बिल्कुल  हट जाता है वह सर्वज्ञ पुरूष कहलाता है।अतीत में  कितने सर्वग्य पुरूष पैदा हो चुके हैं ।मेरा विश्वास है कि  अब भी बहुत से लोग ऐसे होंगे और आने वाले समय में भी ऐसे   असंख्य   पुरुष जन्म लेंगे ।जिस प्रकार एक जगमगाते पत्थर के टुकड़े में अग्नि निहीत रहती है ,उसी प्रकार मनुष्य के मन में ज्ञान रहता है ।बाहरी क्रियाओं यानी घर्षण से अग्नि जलने के समान मनुष्य में भी ज्ञान की अग्नि प्रकाशित हो जाती है ।।
यदि हम शांत होकर स्वयं का अध्ययन करें ,तो प्रतीत होगा कि हमारा हंसना ,रोना, सुख-दुख ,हर्ष ,विषाद हमारी शुभकामनाएं ,शाप ,प्रस्तुति और निंदा ये सभी हमारे मन के ऊपर अनेक घात-प्रतिघात के फलस्वरूप उत्पन्न हुए हैं हमारा वर्तमान चरित इसी का फल है यह सब घात प्रतिघात मिलकर कर्मम  कहलाते हैं।

आज के अंक मे बस इतना ही
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