What is satsang and swadhyay

 जैसा व्यक्ति चिंतन करता रहता है वैसा ही वह बन जाता है पुरानी कहावत है -और बहुत सही है आदमी की सोच उसकी कल्पना उसके विचार उसका चिंतन सब उसके मन मस्तिष्क में सोच में परिवर्तन करते हैं जिस विषय का वह चिंतन करता है उस विषय में डूब कर आनंद लेने लगता है तथा उस विषय में आगे बढ़ने की उसके अंतर्मन में प्रेरणा होती रहती है।

परम आनंद कैसे प्राप्त करें

 बार-बार का चिंतन प्रेरणा को बलवती बनाता है । प्रेरणा उत्साह में बदलती है ,उत्साह पहले तीव्र इच्छा में  की प्रबलता का दृढ़ता निश्चय उत्पन्न करती है और निश्चय तथा संकल्प के रूप में उभरकर सामने आता है इस प्रकार चिंतन अंतः क्रियात्मक रूप लेता है ।जैसे रस्सी के एक सिरे को यदि लगातार उमेठते रहे तो बल शनैः शनैः रस्सी के दूसरे सिरे तक पहुंच जाता है  ।
अतः चिंतन का भी अत्यंत महत्व है और चिंतन को संगति या अध्ययन दो चीजें विशेष रूप से प्रभावित करती हैं जैसी व्यक्ति की कंपनी होती है या जैसा वह पढ़ता रहता है उसी के अनुसार उसकी सोच या चिंतन डेवलप होता है इसलिए पुस्तकों का उत्तम तथा संगति का श्रेष्ठ होना जरूरी है यही सत्संगति और स्वाध्याय का महत्व है ।

अलग-अलग सोच के क्या परिणाम होते हैं


संगति में व्यक्ति सुनता वह देखता है ।अध्ययन में पढता है ,बाद में इस सुने हुए को ,पढ़े हुए को गुनता है यही चिंतन है ।गुनकर उसे आत्मसात करता है ।आत्मसात कर व्यवहार या प्रयोग में लाता है ,प्रयोग में ना लाया जाए वह ज्ञान ,दिमाग में पड़ा हुआ भी उतना ही बेकार है जितना पुस्तक में पडा़ हुआ ।पुस्तक मस्तिष्क में रखी है या पुस्तकालय में बेकार है, यदि प्रयोग में नहीं ढाली गई ।उल्टे पढ़ने वाले के दिमाग में एक अहं और पलने लगता है कि मैंने अमुक विषय पर इतनी पुस्तके पढ़ ली ।
वास्तव में पढ़ी गई पुस्तकें यदि समझी और प्रयोग में नहीं लाई गई तो व्यक्ति उन पुस्तकों का केवल वजन ही ढोता है ।जैसे गधे की कमर पर पुस्तकें लाद दें तो गधा विद्वान नहीं हो जाता, मात्र उन पुस्तकों को वहन करता है ।कहा भी गया है --जैसे चंदन के काष्ठ को ढोने वाला गधा उसके भार को जानता है ,उसके मूल्य को नहीं जानता ।
इसीलिए तो आदि गुरु शंकराचार्य को भी कहना पड़ा -पशुओं से भी पशु वह है जो धर्म का पालन नहीं करता ।जिसे शास्त्रों को पढ़ लेने के बाद भी आत्मबोध नहीं होता ।अतः अध्ययन वही जिस में "स्व" सम्मिलित हो।तभी स्वाध्याय कहा गया ।".स्व "शामिल होगा तो पढा़ हुआ समझ में आएगा वरना किताब पढ़ना या रटना होगा। स्व को इन्वॉल्व न करने पर कुछ लाभ नहीं है -न तो पढ़ने का ,न तो संगति का  और ना ही जप तप का ।फिर सब पाखंड  रह जाता है ।कोरा कर्मकांड रह जाता है ।
ऐसे ही लोगों के लिए कबीर को कहना पड़ा ----
माला फेरत जुग भया, मिटा न मन का फेर ।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर ।

कुंडलिनी शक्ति क्या है

इसलिए मन को स्व मे डुबोये बिना किए गए कार्य का  न तो पूर्ण लाभ मिलता है न आनंद ही होता है ।आनंद आता है जब स्व उस क्रिया में संलग्न हो।
आज के लिए बस इतना ही 
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