What is serpentine power

बहुत से पाठकों का यह सवाल है कि कुंडलिनी शक्ति क्या है तो हम आज आपको कुंडलिनी शक्ति के बारे में बताने जा रहे हैं साधारण तौर पर कहा जाए तो कुंडलिनी शक्ति मनुष्य की देह में सोया हुआ वह चमत्कारिक करेन्ट ,उर्जा अथवा शक्ति है जिसके अभाव में सभी के सभी चक्र यानी पावर स्टेशन निष्क्रिय रहते हैं ।
वे चक्र  जो सक्रिय  हो जाने पर अनेक चमत्कारीक प्रभाव व सिद्धियां देने वाले हैं इस कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने के विभिन्न उपायों में एक उपाय योग भी है ःः

जिस प्रकार पर्वत वन सागर आदि को धारण करने वाली पृथ्वी का आधार अनंतनाग है उसी प्रकार शरीर की समस्त गति किया  ,शक्ति व समस्त योग तंत्रों का आधार कुंडलिनी शक्ति है ।
ऋग्वेद में कही गई एक विचार वास्तव में कुंडलिनी की महिमा दर्शाती है जिसका अर्थ है" मै जिसे जो चाहती हूं बना देती हूं सम्राट ,योगी ,और मेधावी बनाती हूं ।

मनुष्य के शरीर के भीतर बहुत प्रकार की शक्तियां छिपी हुई पड़ी है जिसका कि उसे ज्ञान नहीं है मनुष्य के भीतर कौन-कौन सी शक्तियां छिपी है इसकी जानकारी के लिए नीचे का लिंक अवश्य पढ़ें

मनुष्य के भीतर छिपी हुई कौन-कौन सी शक्तियां हैं



कुंडलिनी शक्ति को काश्मीक एनर्जी  सर्पेट पावर अथवा विश्वव्यापीनी शक्ति भी कहते हैं यह एक अग्निमय गुप्त शक्तितिहै।  आधुनिक विज्ञान के अनुसार प्रकाश की सबसे तेज गति 150000 मील प्रति सेकंड है जानकारों के अनुसार कुंडली प्रकाश से भी तेज गति से चलती है इसकी चाल 345000 मील प्रति सेकंड है।
कुंडलिनी शक्ति का नाम कुंडलिनी होने का कारण इसका 3:30 लपेटे खाया हुआ कुटिलाकार है।


 सर्प के कुंडली मारे रहने के समान ही यह शक्ति भी कुंडली मारे मूलाधार में पड़ी होती है गुह्य प्रदेश में गुदा से दो अंगुल पहले ,बीच मे (चार अंगुल विस्तार वाले मूलाधार में ) मूलाधार के कंद में दक्षिणावृत से 3:30 फेरे  लगाए हुए नीचे को मुख किए सर्पिणी के सदृश अपनी ही पूछ को अपने मुंह में दिए हुए सुषुम्ना के विवर में कुंडलिनी शक्ति का वास है ।
यह सभी नाडियों को स्वयं में लपेटे हुए हैं ।
संपूर्ण ब्रह्मांड में जितनी भी शक्तियां विद्यमान हैं उन सब को ईश्वर ने मनुष्य रूपी शरीर के पिंड में एक स्थान पर एकत्रित कर दिया है यही शक्ति कुंडलिनी है गुदा व लिंग के बीच में स्थित योनि मंडल में यह शक्ति वास करती है सुषुम्ना नाड़ी का मुख त्रिकोण साधारण अवस्था में बंद रहता है वह शक्ति प्रवाह में नहीं होती सुप्त या अविकसित  अवस्था में रहती है इस सुषुम्ना नाड़ी के दाएं-बाएं जाने वाली पिंगला व इडा  नाडियो में प्राण शक्ति निरंतर प्रवाह में रहती है  । योगा आदि उपायों द्वारा सुषुम्ना का मुख्य त्रिकोण खोलकर कुंडलिनी का प्रवाह ऊपर की ओर किया जाता है कुंडलिनी का उपयोग किया जाता है यह शक्ति कुंडलिनी है ।
इसे भी पढ़ें

मानव जीवन के 4 अनोखे सत्य



  आकार (अ )पूरी वर्णमाला का आरंभ है ।ना सिर्फ आरंभिक बल्कि अंत भी है और अ से ज्ञ तक संपूर्ण वर्णों के साथ लिप्त है।आप किसी भी वर्ण का उच्चारण करें उसके अंत में अ की फीलिंग अवश्य आएगी ठीक वैसे ही जैसे सृष्टि ईश्वर से आरंभ होकर अंत इश्वर में ही लय होती है। इसके बावजूद सृष्टि में जो कुछ है और जो कुछ नहीं भी है सभी में ईश्वर व्याप्त होता है फिर भी सृष्टि से अलग होता है जैसे किसी भी वर्ण के उच्चारण में अ की फीलिंग प्रारंभ या अंत में अवश्य होती है बिना अ की फीलिंग को जोड़ें कोई भी वर्ण बोला नहीं जा सकता इसके बावजूद स्वयं अ (अकार)वर्ण वहां उपस्थित नहीं होता उदाहरण के तौर पर क का उच्चारण करने में क के साथ अ की फिलीग (क्+अ )स्पष्ट होती है ।।किंतु स्थूल रूप से तो वहां क वर्णण होता है अ नहीं इसी प्रकार अन्य वर्णों का उच्चारण करके पाठक स्वयं शोध कर सकते हैं ।
अकार( अ )को  अनुत्तर या निरूत्तर इसीलिए कहा जाता है ,कि इसके बाद कोई तत्व /वर्ण नहीं बचता, जो इसमें लय ना  हो ।अर्थात वर्णमाला की सृष्टि अ (अकार )से ही होती है।और पूरी मातृका का संहार भी अ (अकार)में ही होता है ।इसी प्रकार ब्रह्म भी अनुत्तर या निरुत्तर इसी आधार पर कहा जाता है इसीलिए गीता में भी भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है --मैं अक्षरों में अकार हूं ।
इसीलिए अक्षर ब्रह्म या शब्द ब्रह्म कहा गया। संगीत एक कला है ,एक साधना है ,एक पूजा है ,संगीत को ध्यान (कंसंट्रेशन )तथा ईश्वर साक्षात्कार का एक प्रबल माध्यम माना गया है ।ऐसा है भी (यहां हम पाप संगीत की बात नहीं कर रहे वह तो शोर मात्र है। उसमें रस व विभोरता नहीं  उच्छृंखलता व अस्थिरता  होती है। क्लासिकल म्यूजिक के स्रोताओं की गर्दन झूमती है नेत्र बंद हो जाते हैं। यह तन्मयता की ,गंभीरता से रसास्वादन की स्थिति होती है इससे सिद्ध होता है कि श्रोता का मन ,बुद्धि इंद्रियां वहीं पर स्थिर हो रहती हैं ।किंतु वेस्टर्न म्यूजिक/ पॉप म्यूजिक आदि में श्रोता के हाथ,पैर व संपूर्ण शरीर हिलने लगता है । नेत्र फट पड़ते हैं।

वास्तव में मनुष्य क्या है उसका वास्तविक स्वरूप क्या है जानने के लिए नीचे का लिंक अवश्य पढ़ें

मैं कौन हूं


  यह उच्छृंखलता , बेचैनी व अशांति की स्थिति को दर्शाता है ।यह एक मोटा उदाहरण है ,जो आराम से समझा जा सकता है क्योंकि संगीत में संगति है क्योंकि संगीत में सुर हैंं ।(सुर व शोर  में बहुत अंतर होता है )। क्योंकि संगीत में तल्लीनता है ,क्योंकि संगीत में रस और आनंद है ।क्योंकि संगीत में शब्द है शब्द से उत्पन्न होने वाली तरंगे हैं ।
संपूर्ण सृष्टि वाइब्रेशन यानी तरंगों से उत्पन्न हुई है इस सत्य को आधुनिक विज्ञान भी मानता है ।भारतीय मत भी नाद( तरंगों )द्वारा सृष्टि का होना मानता है । अतः तरंगों का सृष्टि के सृजन व विनाश में में स्पष्ट महत्व है ।
डायनामाइट का धमाका (तरंगें )विध्वंस कर सकते हैं तो संगीत के सुर  सृजन कर सकते हैं , बारिश करा सकते हैं , पत्थर को पिघला सकते हैं ,दीपक को जला सकते हैं ,पशु पक्षियों और मनुष्यों को सम्मोहित कर सकते हैं ,पेड़ पौधों को पल्लवित पुष्पित कर सकते हैं ,व्यक्ति के मनोभावों को बदल डालना तो बड़ा स्थूल प्रभाव है ।
आधुनिक विज्ञानवादी पेड़-पौधों वन्यजीवों पर संगीत से पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन कर चुके हैं और तो और संगीत द्वारा रोगों का निवारण एवं चिकित्सा भी संभव है ।और आधुनिक विज्ञान भी इसे मानता है ।।मिलिट्री बैंड ,बिगुल ,नगाड़े आदि एक जोश व वीरभाव का श्रोता में संचार करते हैं ,तो मरसिया (मृत्यु पर बजाए जाने वाला संगीत) दूसरा ही भाव पैदा करता है ।वहां करूणा, व दुख स्वतःसुनने वालों में उत्पन्न हो जाता है। शादी के अवसर पर बजाए गए संगीत का प्रभाव कुछ और होता है वहां शहनाई व सारंगी जैसा वाद्य यंत्रों का विशेष उपयोग रहता है ।पार्टी के संगीत का प्रभाव कुछ और तथा लोरी के संगीत का कुछ और होता है ।
(मिलिट्री बैंड कभी झप ताल ,,दादरा ,रूपक आदि अपेक्षाकृत विलंबित तालों पर नहीं बजाया जाता ।लोरी कभी कहरवा, खेमटा आदि द्रूत तालों पर  नही गाई जातीहै। क्योंकि मिलिट्री बैंड का उद्देश्य उत्तेजना व जोश का संचार करना होता है जबकि लोरी का उद्देश्य शांति और स्थिरता का)  बहरहाल --
तरंगों द्वारा सृष्टि में ,भावों में, पदार्थों में परिवर्तन संभव है और संगीत में तरंगे  ही होती हैं। पूरी तल्लीनता के साथ सही तरंगों का सही मात्रा में सही वैलासिटी पर ,सही समय पर ,सही समय तक, पूर्ण संगति के साथ प्रयोग आखिर साधक को   ब्रह्म का साक्षात्कार भी करा सकता है।
आज के लिए बस इतना ही 
Previous
Next Post »