Kya devi devata ko bali chadhane chahiye

देवी देवता जीवनदायक होते हैं जीवन लेते नहीं हैं लोगों के बच्चे बीमार होते हैं कोई असाध्य बीमारी हो जाती है या वह किसी गंभीर परेशानी में होते हैं तो वह देवी देवताओं के दरबार में अरदास लेकर जाते हैं कि मेरे बच्चे को ठीक कर दीजिए ,मेरी परेशानी को हल कर दीजिए यदि वही देवता अगर किसी  जीव की बलि लेकर किसी के बच्चे को जीवनदान दे तो वह देवता नहीं बल्कि दैत्यो से भी गए गुजरे हैं ।कोई भी देवी देवता किसी जीव की बलि नहीं मांगते एक जान लेकर एक को जीवनदान देना यह कहां का न्याय है ।
देवी देवता को बलि दी जाती है लेकिन जीव की नहीं बल्कि आटे के पिंड की या जंगली कुम्हडे की   जिसका कि पेठा बनता है हिमाचल प्रदेश में स्थित देवी चिंतपूर्णी से संबंधित कथा के अनुसार भक्त माई दास ने अपना सिर काटकर देवी को चढ़ाया था तब देवी प्रकट होकर उन्हें जीवित कर दी थी और अपने भक्तों से वरदान मांगने को कहा था तब भक्तों ने कहा था हे देवी कलयुग में इतनी कठिन परीक्षा कोई नहीं दे सकेगा उस से प्रसन्न होकर देवी ने कहा भक्तों अब से जो प्राणी जलयुक्त नारियल मुझे चढ़ाएगा उससे मैं अति प्रसन्न रहूंगी और उसे ही बलि समझकर ग्रहण करूंगी।
देवी देवताओं को नारियल ही क्यों चढ़ाया जाता है इस संबंध में अधिक जानकारी के लिए नीचे के लिंक को पढे
देवी देवताओं को पानी वाला नारियल चढ़ाया जाता है क्यों


 भेड़ बकरी और किसी जीव की बलि देवी देवता नहीं मांगते ऐसा कहीं लिखित प्रमाण नही मिलता है जीवो की बलि चढ़ाने के पीछे लोगों का अपना निजी स्वार्थ होता है बलि चढ़ा कर उसका मांस पका कर अपनी जीभ का स्वाद बनाते हैं । मांस से क्षुधा की तृप्ति करते हैं  ।
जीवो की बलि चढ़ाना पाप ही नहीं बल्कि महापाप है बल्कि महापाप है ।
आप स्वयं विचार करें कि आपको जरा सी खरोच आ जाती है तो आप चीख पडते हैं और जिसका गला काट देंगे उसको कितनी पीड़ा होगी क्या यह जानने का प्रयास आपने कभी किया है क्या आप नहीं जानते हैं कि ईश्वर कण कण में व्याप्त है जो ईश्वर आपके अंदर है वह ईश्वर उस जीव में  भी है चाहे वह बकरी हो भेड़ा हो या अन्य कोई भी हो उसमें भी ईश्वर का ही निवास है उसे भी वैसे ही दर्द की अनुभूति होती है जैसा कि आपको होता है जैसा की आपको होता है ।
जीवो पर दया करे वे निरीह है ।
हमें आशा है कि आप इस लेख को पढ़ने के बाद यदि इस अंधविश्वास को मानते होंगे तो इसे छोड़ देंगे यह लेखक का अपना विचार है परंतु आप अपने विचार को मानने के लिए स्वतंत्र हैं
नवरात्रों में देवी पूजा का महत्व ---
नवरात्र वर्ष में दो बार आते हैं ःआश्विन मास में, और चैत्र मास में ।आश्विन मास के नवरात्रि को शारदीय नवरात्र तथा चैत्र मास के नवरात्रि को वासंतीय नवरात्र कहते हैं ।
जिसमें शारदीय नवरात्र की अधिक मान्यता होती है इन दिनों को लोग देवी का दिन मान कर मांगलिक कार्य भी संपन्न कराते हैं सगाई आदि जैसे शुभकार्य कराना तो ठीक है किंतु नवरात्रों में विवाह संस्कार कदापि न करें क्योंकि यह समय विवाह के लिए शुभ नहीं होते अश्विन और चैत्र महीने को यमदृष्टा कहा गया है ,जो प्राणियों के लिए महान कष्टदायक होता है। इसीलिए इन दिनों को देवी भगवती को सौंपकर अपने तथा अपने परिवार के कल्याण हेतु देवी भगवती की उपासना एवं व्रत करना चाहिए नवरात्र में की गई पूजा ,जप ,तप ,साधना, मंत्र सिद्धियां, तांत्रिक अनुष्ठान आदि पूर्ण रुप से सफल एवं प्रभावशाली होते हैं क्योंकि ,वह आदिशक्ति नवरात्रों में स्वयं मूर्तिमान होकर उपस्थित होती है और उपासको की उपासना का उचित फल प्रदान करती हैं।
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विवाह में अग्नि की परिक्रमा करने का क्या कारण है ---किसी के भी मन में यह विचार उत्पन्न हो सकता है कि विवाह संस्कार में अग्नि की ही परिक्रमा क्यों की जाती है अग्नि के चारों तरफ फेरे वर-वधू क्यों लगाते हैं जल का घड़ा रखकर उस का चक्कर भी तो लगाया जा सकता है जल की परिक्रमा करके विवाह क्यों नहीं हो सकता ।।
इसके विषय में विद्वानों का मत है कि जल कितना भी शुद्ध क्यों न हो खुले स्थान में रखते ही प्रदूषित हो जाता है वायुमंडल में विद्यमान जीवाणु उस में प्रवेश कर जाते हैं किंतु अग्नि न तो कभी दूषित हुई है और ना होगी अग्नि सदा पवित्र रहती है और सदैव पवित्र तथा शुद्ध रहेगी इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता ।कारण की यह अपनी दाहकता से हर वस्तु को शुद्ध बना देती है तो वह स्वयं कैसे अशुद्ध हो सकती है ।इसीलिए विवाह संस्कार के समय अग्नि को साक्षी मानकर वर वधु उसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं और सात परिक्रमा करते हैं 7 बार परिक्रमा करने का धार्मिक दृष्टि से यह है कि हम दोनों एक दूसरे को सात जन्मों के लिए वरण   करते हैं ।
विवाह में अग्नि की परिक्रमा करते समय वधू सदैव आगे होती है इसका क्या कारण है-----
स्वयं देवताओं ने नारी को प्रथम स्थान प्रदान किया है नारी वर्ग सदैव अग्रपूज्य रहीं है। 
प्रमुख देवताओं के नामों का जप करते समय भी आप यही पाएंगे जय श्री राधे कृष्णा, सीताराम ,उमाशंकर इत्यादि ।जब देवता नारी को अग्रणी मानते हैं तो हमें भी मानना चाहिए यही कारण है कि विवाह में अग्नि का चक्कर लगाते समय वधू आगे आगे चलती है और वर उसके पीछे पीछे चलता है
मनुष्य के भीतर बहुत प्रकार की शक्तियां समाहित है जिसका उन्हें जान भी नहीं है इसकी जानकारी हेतु नीचे का लिंक अवश्य पढ़ें
मनुष्य के भीतर छिपी हुई कौन-कौन सी शक्तियां हैं


आज के अंक में बस इतना ही 
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