How find pleasure

नमस्कार दोस्तों आज हम अपने इस ब्लॉग में धर्म से संबंधित जानकारियां प्रदान करेंगे तो आज का विषय है परम आनंद यह परम आनंद क्या है आइए जानते हैं दोस्तों अक्सर अध्यात्म के ज्ञाता कहते हैं कि ईश्वर की शरण में जाने से मनुष्य को परम आनंद की प्राप्ति होती है क्या है परम आनंद और कहां है ईश्वर जहां जाकर वह उनके चरणों में शरण्य ले।

लगन व धैर्य और सद्गुण क्या हैं

परमानंद के बारे में भगवान ने गीता में बताया है की वह स्थिति जिसमें मनुष्य सुख-दुख हानि-लाभ क्रोध मोह और अहंकार आदि से मुक्त होकर स्वयं में स्थापित हो चुका हो मन इंद्रियों द्वारा मनुष्य को संसार में लिफ्ट करके उसकी प्रवृत्ति को वह बनाता है और वह संसार में इंद्रियों के द्वारा सुख की खोज में भटकता रहता है और जीवन मरण का चक्कर लगाता रहता है इसीलिए परमानंद की प्राप्ति के लिए सबसे पहले मन की प्रवृत्ति को अपने अंदर की ओर मुड़ना चाहिए। 

अज्ञानवश लोग मन को बलपूर्वक संसार से व्यक्त करने की कोशिश करते हैं जो की पूर्णतया गलत मार्ग है ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसी स्थिति में जब भी मन का नियंत्रण ढीला पड़ता है वह दोबारा इंद्रियों के द्वारा संसार के लोगों में लिप्त हो जाता है इसीलिए आनंद के लिए पहले कदम के रूप में मनुष्य को सबसे पहले संसार का लेन देन समाप्त करना चाहिए लेन देन केवल धन तक ही सीमित नहीं है बल्कि भावनात्मक पहलू धन से भी ज्यादा महत्वपूर्ण व आवश्यक है नकारात्मक भाव के कारण वह कामना रूपी प्रेम अहंकार जलन एशिया और बदले की भावना व क्रोध से पीड़ित रहता है इन्हीं भावों के कारण उसे शारीरिक रोगों जैसे ब्लड प्रेशर डायबिटीज और हृदय रोग होने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं भगवान ने गीता में यह भी बताया है कि विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष उन विषयों में आसक्त हो जाते हैं आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में भीगने पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध से विवेक समाप्त होकर बुद्धि भी नष्ट हो जाती है इस प्रकार मनुष्य का पतन हो जाता है सनातन धर्म में मनुष्य के जीवन चक्र को नियत नियंत्रित करने के लिए आश्रम व्यवस्था है वानप्रस्थ आश्रम में मनुष्य को धीरे-धीरे अपने आप को व्यस्त आश्रम व दुनियादारी के लेनदेन से मुक्त कर लेना चाहिए और जीवन के शेष भाग को परम आनंद में स्थित हो जाना चाहिए इस प्रकार सारे नकारात्मक भाव मिट जाएंगे और आप जीवन में वास्तविक आनंद प्राप्त कर सकेंगे
मनुष्य हर पल आनंद की आकांक्षा में रहता है इसकी खोज के लिए वह निरंतर प्रयासरत रहा है किसी को पढ़ने में आनंद आता है तो किसी को खेलने में किसी को लिखने में आनंद आता है तो किसी को बड़ी-बड़ी बातें करने में आनंद आता है अक्सर यह भी देखा गया है कि जितना हम आनंद के पीछे भागते हैं उसके लिए छटपटाते हैं आनंद उतना ही हमसे दूर भागता हुआ दिखाई देता है हमारी स्थिति कुछ उसी तरह की हो जाती है जैसे मरुस्थल में पानी न मिलने पर एक मृग की होती है और हम विषाद से घिर जाते हैं ।आनंद पाने के लिए जरूरी है सरलता और सहजता जब जब भी आप सहज और सरल होते हैं आप उतने ही आनंद के समीप होते हैं हम देखते हैं कि छोटा बच्चा सदा आनंद और मस्ती में होता है क्योंकि वह सरल और सहज अवस्था में जीता है हम आनंद खोजते हैं पदार्थों में धन दौलत में पद प्रतिष्ठा में कंचन कामिनी में जमीन जायदाद में लेकिन हम अनभिग्य हैं कि वास्तविक आनंद की गंगोत्री तो हमारे  भीतर  बह रही है ।
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अलग-अलग सोच के क्या परिणाम होते हैं

स्थाई आनंद की प्राप्ति तो सकारात्मक विचारों से होती है सकारात्मक विचारों से ओतप्रोत मन ही सच्चा आनंद प्राप्त कर सकता है ।
गिलास आधा खाली है कि जगह गिलास आधा भरा है यह सोचा जाए तो मन को अधिक सुकून मिलता है किसी विद्वान ने कहा है कि आपके जीवन की ख़ुशी आपके विचारों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है क्या कभी आपने किसी के दुख को अपना दुख समझा है, क्याया आपने कभी किसी भूखे को भोजन कराया है, नंगे के बदन पर वस्त्रत्र ओढाया है या किसी प्यासे को पानी पिलाया है किसी बीमार को उपचार कराने में मदद की है ,जो प्यासा होने पर भी आपसे एक गिलास पानी मांगते हुए झिझकता हो ,उसे पानी पिला कर तो देखिए आपको कितना आनंद आएगा ,,दीन दुखियों की सेवा आनंद का स्रोत है ।
मदर टेरेसा ने कहा है कि हम कभी नहीं जान सकेंगे कि एक छोटी सी मुस्कान कितना भला कर सकती है भगवान जब आपको सेवा करते देखते हैं तो वे आपकी झोली में आनंद के मोती माणिक्य भरने के लिए उमड़ पड़ते हैं । खुशियों की गंगा प्रवाहित कर देते हैं तभी आप सच्चे स्थाई आनंद की अनुभूति करने के पात्र बनते हैं।
आज के लिए बस इतना ही 
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