What is the result of children's don't care

आज तेजी से बदल रहे सामाजिक परिवेश का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर अब दिखने लगा है बच्चे हिंसक हुए हैं ।
क्या इसका एक कारण बच्चों का अकेलापन है ?अक्सर देखने को मिलता है कि बच्चों के अभिभावक उन्हें इतना समय नहीं दे पा रहे जितना उनके बच्चे को चाहिए क्योंकि बच्चे अपने में मगन रहना सीख गए हैं लिहाजा अपने मन की बात भी अभिभावकों से कहने से भी बचने लगे हैं।
 परिणाम यह है कि वे अवसादग्रस्त हो गए हैं और उनके मन में उलटे सीधे ख्याल पनपते हैं। अब भी यदि ना चे ता गया तो इस प्रवृत्ति के परिणाम भविष्य में और भी बुरे हो सकते हैं। अभिभावकों को अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा समय देना चाहिए उनके साथ घूमना फिरना और उनकी गलत मांगों को समझदारी से मना करना चाहिए उनसे दोस्ताना व्यवहार करना चाहिए।
 सबसे अहम है बच्चों और मां-बाप के बीच का संवाद, यह होगा तो बच्चे अपने मन की बात खुलकर करेंगे ।अगर बच्चे अपनी बातों को अपने माता-पिता से छिपा रखेंगे और मन ही मन घुटते रहेंगे ।
बच्चों की देखरेख की जिम्मेदारी सिर्फ अभिभावकों की ही नहीं है बल्कि स्कूल और कॉलेज प्रबंधन की भी है क्योंकि बच्चे का 6से 8 घंटे का समय स्कूल कॉलेज में ही व्यतीत होता है इसलिए शिक्षण संस्थानों को भी प्रयास करने होंगे और बच्चों की काउंसलिंग भी समय-समय पर करानी होगी।
आज माता-पिता के पास समय की कमी के कारण बच्चे निहायत ही एकाकी होते जा रहे हैं। एकल पारिवारिक संरचना ने बच्चों को बुजुर्गों की गोद, स्नेह युक्त स्पर्श और मनोरंजक एवं शिक्षाप्रद कहानियों से वंचित कर दिया है।

इसके कारण उनमें संस्कार और नैतिक मूल्यों का जबरदस्त अभाव देखने में आ रहा है। यही स्थिति हमारी शिक्षा प्रणाली की भी है ।फलस्वरूप हम उनसे जिस तरह के अनुशासन, मर्यादा एवं सहनशीलता जैसे मानवीय मूल्यों की अपेक्षा करते हैं, वे विकसित नहीं हो पाते ।
एक या दो बच्चों की नीति के कारण बच्चा स्वाभाविक रूप से परिवार का लाडला हो जाता है ,इसके कारण उसके बिगड़ने की आशंका प्रबल हो जाती है ।उसे घर के बाहर भी माहौल ऐसा नहीं मिलता जहां से वह कुछ अच्छे गुण सीख सके ।इससे उसके अंदर सामाजिकता की भावना पनप नहीं पाती।
 नगरों महानगरों में खुले स्थानों के अभाव ने उसके खेल को इंडोर एवं कंप्यूटर गेम की ओर धकेल दिया है। खेल के मैदान बच्चों में सहनशीलता तथा सामूहिकता की भावना विकसित करने के सर्वोत्तम एवं स्वाभाविक माध्यम होते हैं ।
ऐसे में सचिन तेंदुलकर की उस दिवस की परीक्षा सचमुच मन को छू जाती है ,जिस दिन माता पिता अपने बच्चों से पढ़ाई करने के बजाए खेलने के बारे में पूछेंगे ।
जो कुछ थोड़ा बहुत बचा था उन सब का सत्यानाश कर दिया इंटरनेट ने ।
यह भी धीरे-धीरे मादक पदार्थों की तरह एक नशे का रूप लेता जा रहा है ।यही कारण है कि कई  देशों ने बच्चों के लिए इस पर प्रतिबंध लगा दिया है। निसंदेह इस पूंजीवादी व्यवस्था ने आज के बच्चों को जितना अधिक महत्वाकांक्षी बना दिया है वह उनके संस्कारों एवं मूल्यों के क्षरण का एक बहुत बड़ा कारण बन गया है ,एवं जल्दी से सब कुछ पा लेने की चाहत ने उन्हें अंदर से बेहद बेचैन और असंतुलित कर दिया है।  इसी की परिणति हम साधनों की पवित्रता के पतन के रूप में देख रहे हैं ।
कुल मिलाकर यह कि हमें इस बात को अच्छी तरह से समझ कर खुले मन से स्वीकार करना होगा कि कोई भी बच्चा अपराधी बच्चे के रूप में जन्म नहीं लेता ,आगे चलकर वह जो भी रूप धारण करता है वह समाज के सांचे के अनुकूल होता है इसलिए नाबालिगों द्वारा किए जाने वाले अपराध को परिवार एवं समाज द्वारा किए जाने वाले अपराध के रूप में देखा जाना चाहिए तभी इसका कुछ हल निकल सकेगा।

अब माता-पिता के लिए और जरूरी हो गया है कि स्कूल से लौट कर आने पर बच्चों से बात करें। सब कुछ कहे सुने ,कोई अनहोनी होने से पहले स्थिति को समझने की कोशिश करें ।यह संवाद आपको न सिर्फ  बच्चे के करीब ले जाएगा बल्कि आप इस स्कूल के बारे में भी बहुत कुछ जान सकेंगे इसलिए स्कूल से लौटने पर बच्चों से सवाल कीजिए और जानिए कि उनका दिन कैसे बीता। हां यह ख्याल रहे कि बच्चों से सवाल करने का ढंग सही हो ।इस आपसी बातचीत में पॉजिटिव होते हुए उनसे वह सब जाने जो वे स्कूल में एकेडमिक ही नहीं, पर्सनल फ्रंट पर भी फेस कर रहे हैं ।स्कूल से लौटने के बाद बच्चों के मन को टटोलना वाकई जरूरी है यह आज के समय की दरकार भी है। और आपकी जिम्मेदारी भी कि आप बिना झिझक उनसे दिनभर के शिड्यूल के बारे में पूछें वाशरूम जाने से लेकर लाइब्रेरी विजिट तक हर बात के बारे में पूछिए क्लास रूम की मस्ती से लेकर खेल के मैदान तक जो भी हुआ वह जानिए।
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अलग-अलग सोच के क्या परिणाम होते हैं
 बच्चों के लौटने के बाद उन पर ध्यान दीजिए याद रखें बच्चे अपना मन तभी खोलते हैं जब उन्हें लगने लगता है कि उनकी बातें सुनी जा रही है, नकारात्मक सवालों की झड़ी लगाने की बजाय आप उनकी बात सुनकर सही हल सुलझाएं ऐसा भरोसा उनके मन में जगाना जरूरी है। ऐसा हुआ तो  बच्चे  खुद आपको अपने मन की बात कहने लगेंगे अभिभावकों का उपेक्षा भरा व्यवहार देखकर बच्चे अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार को घर पर नहीं बताते हैं यही बात आगे चलकर उनके लिए बड़ा खतरा बन जाता है। इसलिए उनके मन की सुनते हुए ही आप ऐसा कुछ जान पाएंगे जो या तो आपको चिंता देगा या यह भरोसा दिलाएगा कि स्कूल परिसर में बच्चा खुश है और सुरक्षित है ।
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अवसर और सफलता क्या है

बच्चे बहुत छोटी क्लास के हों तो टीचर्स के अलावा स्कूल स्टाफ के किसी बड़े ने उनसे क्या कहा यह भी जाने ऐसे कई मामले इन दिनों सामने आए हैं जिनमें स्कूल स्टाफ के ही किसी सदस्य ने बच्चे के साथ दुर्व्यवहार किया है ।सीनियर स्टूडेंट्स ने भी छोटे बच्चों पर हमले किए हैं इतना ही नहीं कई बार क्लासमेट्स और टीचर्स का व्यवहार भी बच्चों के लिए बहुत तकलीफ देह होता है इतना ही नहीं कई तरह का गलत व्यवहार और बुरी भाषा भी बच्चे अपने दोस्तों से सीखते हैं ।ऐसी संगत उन्हें चाहे-अनचाहे गलत राह पर धकेल देती है कुछ बच्चे ना चाहते हुए भी ऐसे जाल में फंस जाते हैं लेकिन घर पर जब तक पता चलता है काफी देर हो चुकी होती है यकीन मानिए बच्चों से स्कूल की ऐसी बातें उनका विश्वास जीतकर ही पता की जा सकती है इसके लिए उनके साथ हो जाना कम्युनिकेट करना जरूरी है यह बातचीत अभिभावक के शेडूल का हिस्सा होना चाहिए।
आज के अंक में बस इतना ही

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