Shanidev ko tel kyun chadhate hain


  1. मान्यता एक_

 क्या सुबह सोकर उठते ही भूमि की वंदना करनी चाहिए ?
माताएं तीन मानी गई हैं ।प्रथम माता जिसने अपनी कोख से जन्म दिया दूसरी गौ माता जो अपनी मां के बाद दूसरे नंबर पर आती है तीसरी पृथ्वी माता जिनकी गोद में सारी  जिंदगी व्यतीत होती है माता शब्द ही इतना स्नेहिल और ममतापूर्ण है कि यह शब्द आते ही सिर स्वयं श्रद्धा से झुक जाता है क्योंकि माता पूजनीय होती हैं ।चूंकि सुबह उठते ही पृथ्वी माता के दर्शन होने से और अपना पैर उनकी गोद में रखते हैं अतः पृथ्वी माता को प्रणाम और उनकी वंदना करनी चाहिए ।यह माता अपने पुत्र रूपी समस्त प्राणियों का भार भी सहन करती है और अन् न उपजाकर भरण पोषण भी करती हैं इसलिए सर्वथा वंदनीय है ।
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  1. मान्यता दो _

क्या शनिदेव लंगड़े हैं ?जो लोग उन्हें लंगड़ा कहते हैं शनि देव के लंगड़े होने की एक पौराणिक कथा है सूर्य देव के पुत्र सनी देव हैं ।इनकी माता का नाम संज्ञा है एक बार सूर्य देव का तेज सहन न कर पाने से संज्ञा ने अपने शरीर से अपनी प्रतिमूर्ति छाया को प्रकट करके कहा कि तुम और मेरे स्वामी एक साथ रहो और मेरे पुत्र की देखभाल करना और पत्नी सुख भोगो ।यह कहकर संज्ञा अपने पिता के घर चली गई उधर छाया का सूर्यदेव  रहस्य नहीं जान सके। छाया अपने पुत्रों का ज्यादा ध्यान रखती थी ।एक बार शनिदेव भूख से व्याकुल होकर छाया के पास गए और बोले माता मुझे बहुत तेज भूख लगी है अभी भोजन दो तब छाया ने कहा अभी  पहले मैं भगवान को भोग लगा लूं और तुम्हारे छोटे भाई बहनों को खिला दूं तब तुम्हें भोजन दूंगी यह सुनते ही शनिदेव को क्रोध आ गया ।बचपन से क्रोध के वशीभूत शनिदेव छाया को मारने के लिए अपना पैर उठा लिए उसी समय छाया ने श्राप दे दिया कि तुम्हारा यह पैर अभी टूट जाए इस तरह सनी देव लंगडे हो गए ।ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बहुत धीमी गति से चलने वाला यह ग्रह है यह एक राशि को ढाई वर्ष में पार करता है इस कारण ज्योतिष शास्त्र भी इसे लंगड़ा कहता है ।



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  • मान्यता 3 _

शनि देव की प्रतिमा पर तेल चढ़ाने का क्या कारण है ?
आनंद रामायण की कथा के अनुसार जब समुद्र पर अपनी बांदरी सेना के सहयोग से श्री रामचंद्र जी ने पुल बांध लिया तब उसकी देखभाल के लिए हनुमान को नियुक्त किया कि कोई राक्षस इसे क्षति ना पहुंचा सके ।संध्या के समय हनुमान जी अपने प्रभु श्रीराम के ध्यान में मग्न थे उसी समय शनिदेव आए और कहने लगे कि सुना है तुम बहुत शक्तिशाली हो यदि शक्तिशाली हो तो मुझसे युद्ध करो उस समय हनुमान ने शनि देव को समझाया कि मैं अपने प्रभु का ध्यान कर रहा हूं किंतु सनी देव नहीं माने तब हनुमान जी ने उन्हें अपनी पूंछ में लपेटकर पत्थरों पर पटकना आरंभ किया शनिदेव का  शरीर लहूलुहान हो गया और वह गिड़गिड़ाकर हनुमान जी से क्षमा मांगने लगे और बंधन मुक्त करने की प्रार्थना करने लगे तब हनुमान जी बोले कि पहले मुझे एक वचन दो कि मेरे प्रभु श्री राम के भक्तों को कभी कष्ट नहीं दोगे शनिदेव ने वचन दिया तब हनुमान जी ने उन्हें बंधन मुक्त किया लहूलुहान हो चुके शनिदेव ने अपने घाव की पीड़ा मिटाने के लिए हनुमानजी से तेल मांगा हनुमान जी ने जो तेल दिया उसे घाव पर लगाते ही शनिदेव की पीड़ा मिट गई तभी से शनिदेव को तेल चढ़ाए जाने लगा तेल चढ़ाने से शनि देव प्रसन्न होते हैं ।

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मान्यता 4 _
कीर्तन में लोग ताली क्यों बजाते हैं इसका क्या लाभ है ?

  • धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कीर्तन करते समय ताली बजाने का यह अर्थ है कि भक्त भगवान के नाम में इस तरह लीन हो जाते हैं उनकी मस्ती में डूब जाएं नाम की मस्ती में मस्त होकर झूमने लगे और ताली बजाएं ताली की ध्वनि तरंगें प्रभु को आंदोलित करती हैं जिससे वे अपने भक्तों की रक्षा करने और कृपा रस बरसाने उस स्थान पर स्वयं पहुंच जाते हैं वैज्ञानिक दृष्टि के अनुसार हथेली की नसों का एक्यूप्रेशर से शरीर के सभी रोगों का निदान किया जा सकता है खून की समस्त नाडियां हथेली तक आती हैं अर्थात हथेली को सामान्य भाषा में समुद्र कह सकते हैं ताली बजाने से हथेली की अच्छी वर्जिश हो जाती है जिससे शरीर के रोग समाप्त हो जाते हैं ।
  • ताली बजाकर अनजाने में ही लोग अपने शरीर के अंदर के रोगों का इलाज कर लेते हैं।
  •  दिमाग तक की बीमारियां ताली बजाने से नष्ट हो जाती हैं ।इस तथ्य को आज के डाक्टर खुले दिल से स्वीकार करते हैं ।
  • प्रत्येक मनुष्य को दिन में कम से कम 2 बार ताली बजा लेना चाहिए।
  • 5-क्या मनुष्य आत्माएं 84 लाख योनियां धारण करती हैं ?
  • वास्तव में मनुष्य आत्माएं ,पाशविक योनियों में जन्म नहीं लेती हैं ,यह हमारे लिए बहुत ही खुशी की बात है ।परंतु फिर भी कई ऐसे लोग हैं जो यह कहते हैं कि मनुष्य आत्माएं पशु पक्षी इत्यादि 8400000 योनियों में जन्म पुनर्जन्म लेती हैं। वह कहते हैं कि जैसे किसी देश की सरकार अपराधी को दंड देने के लिए उस की स्वतंत्रता को छीन लेती है और उसे एक कोठरी में बंद कर देती है और उसे सुख सुविधा से कुछ समय के लिए वंचित कर देती है ,वैसे ही यदि मनुष्य कोई बुरे कर्म करता है तो उसे उसके दंड के रूप में पशु पक्षी इत्यादि भोगी योनियों में दुख तथा परतंत्रता भोगनी पड़ती है ।परंतु वास्तविकता यह है कि मनुष्य की आत्माएं अपने बुरे कर्मों का दंड मनुष्य योनि में ही भोगती हैं।
  •  परमात्मा कहते हैं कि मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव के अनुसार पशु से भी अधिक बुरा तो बन ही जाता है और पशु पक्षी से अधिक दुखी भी होता है परंतु वह पशु पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म नहीं लेता यह तो हम देखते हैं सुनते भी हैं कि मनुष्य गूंगे ,अंधे, बहरे लंगड़े,  तथा कंगाल होते हैं।। यह भी हम देखते हैं कि कई पशु भी मनुष्यों से अधिक स्वतंत्र तथा सुखी होते हैं ।उन्हें डबल रोटी और मक्खन खिलाया जाता है ,सोफे पर सुलाया जाता है मोटर कार में यात्रा कराई जाती है और बहुत ही प्यार तथा प्रेम से पाला जाता है। परंतु ऐसे कितने ही मनुष्य संसार में है जो भूखे और अर्धनग्न जीवन व्यतीत करते हैं और भी जब किसी से कुछ पैसे मांगने के लिए हाथ फैलाते हैं तो वह उन्हें अपमानित भी कर देते हैं।
  •  कितने ही मनुष्य हैं जो ठंडी के दिनों में ठिठुर कर अथवा रोगियों की हालत में सड़क की पटरियों पर कुत्ते से भी बुरी मौत मर जाते हैं।  जब हम स्पष्ट देखते हैं कि मनुष्य योनि भी भोगी योनि है और मनुष्य योनि में मनुष्य पशुओं से अधिक दुखी हो सकता है तो यह क्यों माना जाए कि मनुष्यों को पशु पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म लेना पड़ता है ।जैसा बीज वैसा वृक्ष---  इसके अतिरिक्त हर एक मनुष्य आत्मा में अपने जन्म-जन्मांतर का पार्ट अनादि काल से अव्यक्त रूप में भरा हुआ है, और इसलिए मनुष्य आत्माएं अनादि काल से परस्पर भिन्न-भिन्न गुण ,कर्म स्वभाव स्वभाव और प्रारब्ध वाली हैं ।मनुष्य आत्माओं के गुण कर्म स्वभाव तथा पाठ अन्य योनियों की आत्माओं के गुण, कर्म, स्वभाव से भिन्न है अतः जैसे आम की गुठली से मिर्च पैदा नहीं हो सकती,बल्कि जैसा बीज वैसा वृक्ष होता है।ठीक वैसे ही मनुष्य आत्माओं की तो श्रेणी ही अलग है ।मनुष्य आत्माएं पशु पक्षी आदि 8400000 योनियों में जन्म नहीं लेती बल्कि मनुष्य आत्माएं  मनुष्य योनि में ही अधिक से अधिक 84 जन्म या पुनर्जन्म लेकर अपने अपने कर्मों के अनुरूप सुख-दुख भोगती है। यदि मनुष्य आत्मा पशु योनि में जन्म लेती तो मनुष्य गणना बढ़ती न जाती।
  •  आप स्वयं ही सोचिए कि यदि बुरे कर्मों के कारण मनुष्य आत्मा का पुनर्जन्म पशु योनि में होता तब तो हर वर्ष मनुष्य की गणना बढ़ती न जाती बल्कि घटती जाती क्योंकि आज सभी के कर्मम, विकारों के कारण विकर्म बन रहे हैं ,परंतु आप देखते हैं कि फिर भी मनुष्य की गणना बढ़ती ही जाती है क्योंकि मनुष्य पशु पक्षी या कीट पतंग आदि योनि में पुनर्जन्म नहीं ले रहे हैं।



आज के अंक में बस इतना ही 
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